आजादी की लड़ाई अभी बाकी है दोस्त..
किसी को रूढि़यां अपनाने के चलन को ना कहने की आजादी चाहिए तो कोई गलती करने की आजादी चाहता है। कोई बिना रोकटोक के अपनी बात कहने का तलबगार है तो कोई रफ एंड टफ के टैग से आजादी चाहता है। जी हां, कुछ ऐसा ही हैं आज के युवाओं के मन का हाल। देश की आजादी के 67 साल बीत जाने के बाद भी ये युवा अपने मन के किसी कोने में कसक महसूस करते हैं। सखी ने युवाओं के मन को टटोला और उनकी आजादी की ख्वाहिशों को जाना।

करियर चुनने की आजादी
नेहा चौहान, 19 साल
आज भी लडकियों को उनकी रुचि का करियर चुनने की आजादी नहीं है। अभिभावक उन पर परंपरागत क्षेत्रों का चुनाव करने के लिए दबाव डालते हैं। मेरे परिवार में भी कुछ ऐसा ही है। मैं एमबीए करने के बाद फाइनेंस सेक्टर में जाना चाहती हूं। लेकिन परिवार के लोग चाहते हैं कि मैं बीएससी करूं और मेडिकल या टीचिंग जैसा कोई सुरक्षित करियर चुनूं। वहीं मेरे भाई को मनचाहा करियर चुनने की पूरी आजादी है। उससे कोई कुछ नहीं कहता। वह अपनी रुचि के अनुरूप बीटेक कर रहा है।
आजादी बंदिशों से
श्री तेजा, 21 साल
आज लडकियां ही नहीं, लडके भी आजादी के लिए तरसते हैं। आज भी हमें अपनी पसंद की लाइफ स्टाइल अपनाने की आजादी नहीं है। कॉलेज में हमें शॉर्ट्स पहनने की मनाही है। अगर कोई लडका शॉर्ट्स पहने नजर आ जाए तो शिक्षक उसके घर वालों को फोन कर देते हैं। उसका आइकार्ड जब्त कर लिया जाता है। दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में यह हाल है तो छोटे शहरों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। अगर कोई लडका-लडकी साथ बैठे या बातें करते हुए दिख जाएं तो पूछताछ होने लगती है कि दोनों का आपस में क्या रिश्ता है। छोटी-छोटी बातों पर बंदिशें लगाना गलत है। काश समाज कभी इस सोच से ऊपर उठ पाए!
ना कहने की आजादी
दीक्षा, 20 साल
हमारे देश में सिर्फ कहने के लिए ही डेमोक्रेसी है। आज भी हम ना कहने के लिए आजाद नहीं हैं। अगर हम प्रचलित मान्यताओं के इतर एक बात भी कहते हैं तो घरवालों को लगता है कि हम विद्रोही हो गए हैं। भले ही हम अपनी बात बेहद नम्रतापूर्वक कहें। किसी रिश्तेदार की शादी में हमारा जाने का मन न हो, तो भी हमें यह कहकर मजबूर किया जाता है कि उनकी मां क्या कहेंगी, अमुक अंकल क्या कहेंगे आदि। हमारी एक नहीं सुनी जाती। हमेशा हमसे ज्यादा महत्व इस बात को दिया जाता है कि समाज क्या चाहता है। आखिर समाज भी तो हम जैसे लोगों से ही बनता है।
गलती करने की आजादी
विशाल चौधरी, 23 साल
आजादी तभी आजादी है जब आप गलती करने के लिए भी स्वतंत्र हों। पर आज समाज में इसका ठीक उलटा हो रहा है। लोग डर-डर कर जिए जा रहे हैं और इसे जिंदगी कहते हैं। खुद कभी लीक तोडने की हिम्मत नहीं जुटा पाए और अपने बचों को भी पहले ही आगाह कर देते हैं कि सुनो, यह लक्ष्मण रेखा है। जबकि हकीकत यह है कि आप अपने अनुभवों से ही सीखते हैं।
मनचाहे परिधान पहनने की आजादी
शिवानी, 20 साल
समाज हमें आजादी से रहने की इजाजत नहीं देता। आज भी हम घर से बाहर निकलते हैं तो लोग फब्तियां कसते हैं। बडे-बडे नेता बयान देते हैं कि लडकियों के पाश्चात्य कपडे पहनने की वजह से ही बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं। जबकि असल में देखा गया है कि ज्यादातर बलात्कार पीडिताओं ने सलवार कुर्ता जैसे कपडे पहन रखे थे। आजादी के हनन और भेदभाव की शुरुआत कॉलेज से ही हो जाती है। उदाहरण के तौर पर हमारे कॉलेज के हॉस्टल में लडकों के लिए हॉस्टल लौटने की डेडलाइन रात नौ बजे है और लडकियों के लिए शाम छह बजे।
रफ-टफ के टैग से आजादी
अर्चित, 19 साल
बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि समाज में बहुत खुलापन आ गया है। लेकिन यह आजादी असल में खोखली और भ्रमित करने वाली है। आज जितना लडकियां आजादी के लिए तरस रही हैं, उतना ही लडके भी इसके लिए परेशान हैं। मैंने जब अपने परिवार से कहा कि मैं बीए करना चाहता हूं, तो सब मुझे हिकारत भरी नजरों से देखने लगे। मुझसे कहा गया कि बीए जैसे विषय तो लडकियां चुनती हैं। मुझे ऐसा विषय चुनने को कहा गया जिसे करने के बाद मैं कम समय में अधिक पैसे कमा सकूं।
अभिव्यक्ति की आजादी
श्रेओसी, 20 साल
हमारा आजाद होने का भ्रम समय-समय पर टूटता रहता है। कभी घर पर, कभी राह चलते तो कभी कॉलेज में। कुछ माह पहले की बात है। हम समलैंगिकता का विरोध करने वाली धारा 377 से जुडे विभिन्न पहलुओं पर आधारित एक प्रोजेक्ट बना रहे थे। जब शिक्षकों को इस बारे में पता लगा तो उन्होंने यह कहकर हमें प्रोजेक्ट बनाने से रोक दिया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को वैध घोषित कर दिया है तो इस पर मंथन करने का कोई औचित्य नहीं है। हमारी बात तक नहीं सुनी गई।
जिम्मेदारी भी जरूरी
डॉ. ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री
आजादी हमेशा अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आती है वरना स्थितियां बेलगाम हो जाएंगी। भारत में आजादी का बहुत गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां सडक चलते कोई भी कहीं भी थूक देता है। कूडा सडक पर फेंक देता है। वही व्यक्ति जब सिंगापुर जाता है तो कूडा डस्टबिन में फेंकना सीख जाता है। लोगों को समझना होगा कि आजादी का मतलब उन्मुक्तता नहीं होता।
हर विषय पर चर्चा की आजादी
गरिमा, 20 साल
मैं बचपन से ही दिल्ली में रही हूं और यहां जैसा मेरा अनुभव रहा है, उस हिसाब से यह भी समाज ही तय करता है कि हम किन विषयों पर चर्चा कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर समाज में सेक्स एजुकेशन को लेकर लोगों की बेहद संकीर्ण मानसिकता है। इस विषय पर होने वाली डिबेट्स कभी टेलीविजन टॉक शोज से बाहर नहीं आ पातीं। इस विषय पर आज भी समाज में खुल कर बात नहीं होती। कोई इस विषय पर स्वस्थ परिचर्चा करे तो उस पर उंगलियां उठाई जाती हैं। जानकारी के अभाव में युवा गलत कदम उठाते हैं और फिर उन्हें दोष दिया जाता है। ऐसे में लोगों के मन में कुंठाएं जन्म लेती हैं और वे अपराधों को अंजाम देते हैं। आज भी लडके शादी से पहले लडकियों से पूछते हैं कि वे वर्जिन हैं या नहीं।
ज्योति द्विवेदी
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