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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 08, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

दिलचस्पः सुना तो बहुत होगा लेकिन पहली बार देखिए लैला-मजनू की असली तस्वीर!

By Abhishek Pratap SinghEdited By:
Published: Wed, 08 Jun 2016 12:24 PM (IST)Updated: Wed, 19 Jul 2017 10:01 AM (IST)

लैला-मजनू की कहानी अमर है और इनका प्रेम भी आज भी लोग इनकी मिसाल देते हैं लेकिन क्या कभी आपने ...और पढ़ें

दिलचस्पः सुना तो बहुत होगा लेकिन पहली बार देखिए लैला-मजनू की असली तस्वीर!
दिलचस्पः सुना तो बहुत होगा लेकिन पहली बार देखिए लैला-मजनू की असली तस्वीर!

लैला-मजनू की प्रेम कहानी आपने अक्‍सर सुनी होगी। सैकड़ों साल पुरानी यह प्रेम गाथा आज भी अमर है। बताया जाता है कि इसका इतिहास कहीं न कहीं भारत से भी नाता रखता है। क्या आपने इस यादगार प्रेमी जोड़े की कभी कोई तस्वीर देखी है अगर नहीं तो इस तस्वीर को देखिए क्योंकि यही मानी गई है लैला-मजनू की असली तस्वीर।

बताया जाता है कि दोनों ने अपनी जिंदगी के आखिरी लम्हें पाकिस्तान बॉर्डर से महज 2 किलोमीटर दूर राजस्थान की ज़मीन पर ही गुजारे थे। यही नहीं इनकी प्‍यार के परिंदों की एक मजार भी बनी है जो काफी फेमस है। आइए जानें क्‍या है इसकी असल कहानी...


कैसे हुई थी इनकी मौत

श्रीगंगानर ज़िले में ‘लैला-मजनू’ की एक मजार बनी है। अनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर में बनी इस मजार पर आज के ज़माने के लैला-मजनू अपने प्यार की मन्नतें मांगने आते हैं। लोगों का मानना हैं कि लैला-मजनू सिंध प्रांत के रहने वाले थे। उनकी मौत यहीं हुई थी यह तो सब मानते हैं, लेकिन मौत कैसे हुई इस बारे में कई मत हैं।

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कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने क्रूर तरीके से मजनू की हत्या कर दी। लैला को यह पता चलते तो वह मजनू के शव के पास पहुंची और उसने खुदकुशी कर ली। हालांकि कुछ लोग अपना दूसरा मत रखते हैं, इनका कहना है कि घर से भाग कर दर-दर भटकने के बाद ये दोनो यहां तक पहुंचे और प्यास से दोनों की मौत हो गई।

मजार पर लगता है मेला
लैला-मजनू के इस मजार पर हर साल 15 जून को दो दिन का मेला लगता है। जिसमें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रेमी और नवविवाहित जोड़े आते हैं और अपने सफल विवाहित जीवन की कामना करते हैं। खास बात यह है कि इस मेले में सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सिख और ईसाई भी शरीक होते हैं। यह पवित्र मजार प्रेम के सबसे बड़े धर्म की एक मिसाल है।

BSF की मजनू पोस्‍ट
दुनिया में अतीत के इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी पूरा सम्मान दिया है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित एक पोस्ट को बीएसएफ की ‘मजनू पोस्ट’ नाम दिया है। कारगिल युद्ध से पहले मजार पर आने के लिए पाकिस्तान से खुला रास्ता था, लेकिन इसके बाद आतंकी घुसपैठ के चलते इसे बंद कर दिया गया।

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