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    हर मोर्चे पर नाकाम रहा रेलवे

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    Updated: Mon, 30 Mar 2015 06:40 PM (IST)

    नई दिल्ली [संजय सिंह]। कुंभ हादसे के बाद लकीर पीटने का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ हादसे से पहले रेलवे की तरफ से पर्याप्त इंतजाम होने का दावा किया जा रहा है तो दूसरी तरफ सोमवार को विशेष ट्रेनों की संख्या अचानक 50 से बढ़ाकर 220 रोजाना करके यह भी स्वीकार कर लिया गया कि ट्रेनों के इंतजाम हद दरजे तक नाकाफी

    नई दिल्ली [संजय सिंह]। कुंभ हादसे के बाद लकीर पीटने का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ हादसे से पहले रेलवे की तरफ से पर्याप्त इंतजाम होने का दावा किया जा रहा है तो दूसरी तरफ सोमवार को विशेष ट्रेनों की संख्या अचानक 50 से बढ़ाकर 220 रोजाना करके यह भी स्वीकार कर लिया गया कि ट्रेनों के इंतजाम हद दरजे तक नाकाफी थे। यही नहीं, भीड़ के साथ उसे कुंभ क्षेत्र से वापस ले जाने वाली स्पेशल ट्रेनों का विभिन्न स्टेशनों में वितरण करने में भी भारी चूक हुई।

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    यह तब हुआ जब कुंभ मेले की तैयारियां छह महीने से चल रही थीं। खुद रेलमंत्री पवन बंसल दिसंबर में चार्ज लेने के बाद ही मौके पर जायजा ले आए थे। इसके बाद इस महीने की 2 व 3 तारीख को दोनों राज्यमंत्री भी पहुंचे। लेकिन अफसरों की पीठ ठोंकने और संगम में डुबकी लगाने के अलावा किसी ने इंतजामों की खामियों पर तवज्जो नहीं दी। रेलवे ने शुरू से ही भीड़ के आकलन में गलती की। उत्तर-मध्य ने पिछले महाकुंभ के मुकाबले महज 25 फीसद ज्यादा भीड़ का आकलन किया, जबकि पिछले महाकुंभ में जहां चार करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया था, वहीं इस बार यह आंकड़ा 10 करोड़ पार करने की उम्मीद की जा रही थी।

    गलत अनुमान का ही नतीजा था कि रेलवे ने पूरे कुंभ के दौरान केवल 1900 अतिरिक्त बोगियों के सहारे रोजाना औसतन 112 सामान्य व 50 स्पेशल ट्रेनें चलाने की व्यवस्था की। यह वितरण अलग-अलग दिनों के लिए अलग-अलग था तो। लेकिन जिस दिन सबसे ज्यादा स्पेशल ट्रेनें चलानी थीं, उस दिन सबसे कम चलाई। मौनी अमावस्या के सबसे बड़े स्नान के लिहाज से 50 स्पेशल ट्रेनें बहुत कम थीं। उनमें भी ज्यादातर को इलाहाबाद जंक्शन व नैनी में समेट दिया गया। जबकि प्रयागघाट, झूंसी, सुबेदारगंज, विंध्याचल और चित्रकूट की उपेक्षा कर दी गई। इससे सारी भीड़ इन्हीं स्टेशनों, खासकर इलाहाबाद जंक्शन की ओर उन्मुख हो गई। यह आकलन भी गलत रहा कि किन दिशाओं से कितने लोग आने-जाने हैं। रविवार शाम 6:00 बजे के बाद तो मेला प्रशासन और रेलवे का तालमेल एकदम गड़बड़ा गया। शाम 7:00 बजे स्टेशनों पर पहुंचने वाली भीड़ का कोई अंदाजा रेल अफसरों को नहीं था।

    हादसे पर रेलवे का रवैया कितना उदासीन था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद रेलमंत्री पवन बंसल ने हादसे पर प्रतिक्रिया देने में काफी देर की। उनसे पहले प्रधानमंत्री का बयान आ चुका था। बंसल जब रात 11:00 बजे के बाद चंडीगढ़ से दिल्ली पहुंचे तो उनके पास पूरी जानकारी नहीं थी। सुबह 11:00 बजे भी वह जब बोले तो भी उनका बयान आश्वस्तकारी नहीं था। झल्लाहट के साथ केवल इतनी जानकारी दे पाए कि अतिरिक्त सदस्य [यातायात] देवी प्रसाद पांडेय के नेतृत्व में एक जांच दल इलाहाबाद रवाना किया गया है। मुआवजे पर उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष की बात की, जबकि ऐसे मौकों पर रेलमंत्री खुद मुआवजे की घोषणा किया करते हैं। बंसल ने इलाहाबाद रवाना होने में भी देर की। इस बीच रेलवे के अफसर पूरी तरह चुप्पी साधे रहे।