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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 10, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

'मां, मुझे माफ कर देना, अब मैं ज़िंदगी से और नहीं लड़ सकती हूं'

By Kamal VermaEdited By:
Published: Wed, 10 May 2017 09:40 AM (IST)Updated: Sun, 14 May 2017 08:53 AM (IST)

मैं बहुत थक चुकी हूं, अब न तो और लड़ा जाता है और न ही ये दर्द बर्दाश्‍त हो रहा है। आप मुझे माफ कर देना।

'मां, मुझे माफ कर देना, अब मैं ज़िंदगी से और नहीं लड़ सकती हूं'
'मां, मुझे माफ कर देना, अब मैं ज़िंदगी से और नहीं लड़ सकती हूं'

नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। उस दिन भी हर चीज रोजाना की ही तरह सामान्य सी ही थी। हमेशा की ही तरह वह भी अपने कॉलेज के लिए घर से हंसी खुशी निकली थी। फिर मन करा तो अपने एक दोस्त के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बना लिया। बस वहीं से कुछ भी सामान्य नहीं रहा। फिर जो कुछ उस लड़की के साथ हुआ उसको देश ही नहीं पूरी दुनिया ने देखा और सुना। जी हां, हम बात कर रहे हैं 16 दिसंबर 2012 की सर्द रात को हुए उस जघन्य कांड को सहने वाली निर्भया की, जिसके दोषियों को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है।

हम आज इसलिए यह कहानी दोहरा रहे हैं क्योंकि यदि आज वह जिंदा होती तो 10 मई को अपना 28 वां जन्मदिन मना रही होती। जिस पीड़ा से वह गुजरी दुआ करनी चाहिए कि अन्‍य किसी को उससे न गुजरना पड़े। 16 दिसंबर से 26 दिसंबर तक वह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही थी। इस दौरान उसने अपनी मां को अपना दर्द कागज पर लिख कर बयां किया था, क्योकि वह कुछ भी कह पाने में असमर्थ थी। इन्हे पढ़कर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

19 दिसंबर 2012

मां मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मुझे याद आ रहा है कि आपने और पापा ने मुझसे बचपन में पूछा था कि मुझे क्या बनना है। तब मैंने आपसे कहा था कि मुझे फिजियोथेरेपिस्‍ट बनना है। मेरे मन में एक बात थी कि मैं किस तरह से लोगों के दर्द को कम कर सकूं। आज मुझे खुद इतनी पीड़ा हो रही है कि डाॅक्टर या दवाई भी इसे कम नहीं कर पा रही है। डाॅक्टर पांच बार मेरे छोटे बड़े ऑपरेशन कर चुके हैं लेकिन दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

20 दिसंबर 2012

मां, मैं सांस भी नहीं ले पा रही हूं। डाॅक्टरों से कहो की मुझे एनेस्‍थीसिया न दें। जब भी मैं आंखें बंद करती हूं तो लगता है कि मैं बहुत सारे दरिंदों के बीच फंसी हूं। जानवर रूपी ये दरिंदे मेरे शरीर को नोच रहे हैं। मां, ये लोग बहुत डरावने हैं। भूखे जानवर की तरह ये लोग मुझपर टूट पड़े हैं। ये मुझे बुरी तरह से रौंद डालना चाहते हैं। मां, मैं अब अपनी आंखें बंद नहीं करना चाहती हूं। मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं अब अपना चेहरा भी नहीं देखना चाहती हूं।

22 दिसंबर  2012

मां मुझे नेहला दो, मैं नाहना चाहती हूं। मैं सालों तक शावर के नीचे बैठे रहना चाहती हूं। मैं उन जानवरों की गंदी छुअन को धो देना चाहती हूं, जिनकी वजह से मैं अपने शरीर से नफरत करने लगी हूं। मैंने कई बार बाथरूम जाने की कोशिश की लेकिन पेट मे दर्द की वजह से उठ नहीं पाई। मेरे शरीर में इतनी शक्ति नहीं है की मैं सिर उठाकर आईसीयू से बाहर खड़े अपनों को देख सकूं। मां आप मुझे छोड़कर मत जाना। अकेले में मुझे बहुत डर लगता है। मैं आपको तलाशने लगती हूं।

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23 दिसंबर 2012

मां, मेरे इलाज के लिए लगाई ये सारी  मशीनरी मुझे उस ट्रैफिक सिग्नल की याद दिलाती हैं जिसके आसपास कई गाड़ियां हॉर्न बजाकर शोर कर रही हैं। लेकिन कोई रुकने का नाम नहीं ले रही है। मेरी आवाज और चीख को कोई नहीं सुन रहा है। ये कमरे की शांति मुझे उस सर्द रात की याद दिलाती है जब उन जानवरों ने मुझे नंगे बदन सड़क पर मेरे दोस्त के साथ फेंक दिया था। मां, पापा तो ठीक है न, उन्हे कहना की दुखी न हों। 

25 दिसंबर 2012

मां, आपने मुझे हमेशा से ही मुश्किलों से लड़ने की सीख दी है। मैं इन जानवरों को सजा दिलाना चाहती हूं। इन दरिंदों को ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता है। ये लोग वहशी हैं। इनके लिए माफी की भूल कर भी मत सोचना। इन्‍होंने मेरे दोस्त को भी बुरी तरह से मारा पीटा था, जब वह मुझे बचाने की कोशिश कर रहा था। उसने मुझे बचाने की बहुत कोशिश की और उसको भी बहुत बुरी तरह से मारा-पीटा गया। अब वो कैसा है।

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26 दिसंबर 2012

मां, मैं अब बहुत थक गई हूं। मेरा हाथ अपने हाथ  में ले लो। मैं अब सोना चाहती हूं। मां, मेरा सिर अपने पैरों मे रख लो। मेरा शरीर साफ कर दो। डॉक्‍टरों से कहकर मेरे इस दर्द को कम करने की दवाई दिलवा दो, बहुत दर्द हो रहा है। मेरे पेट मे दर्द लगातार बढ़ता जा रहा है। डाक्टरों से कहना की अब मेरे शरीर का कोई अंग न काटें, इससे मुझे बहुत दर्द होता है। मां, मुझे माफ कर देना, अब मैं ज़िंदगी से और नहीं लड़ सकती हूं।

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