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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 11, 2012 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जंतर-मंतर से छिना विश्व विरासत का दर्जा

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Published: Mon, 11 Jun 2012 03:41 AM (IST)Updated: Tue, 12 Jun 2012 03:40 AM (IST)

दिल्ली ने अपनी एक बेजोड़ ऐतिहासिक विरासत जंतर-मंतर को खो दिया है। इसके आसपास ऊंची इमारतो के कारण इसके सूर्य ...और पढ़ें

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नई दिल्ली [अंशुमान तिवारी]। दिल्ली ने अपनी एक बेजोड़ ऐतिहासिक विरासत जंतर-मंतर को खो दिया है। इसके आसपास ऊंची इमारतों के कारण इसके सूर्य घड़ी यंत्रों को रोशनी मिलनी बंद हो गई है। सूर्य की स्थिति के आधार पर नक्षत्रों की स्थिति एवं समय की गणना करने वाले 288 साल पुराने अद्भुत खगोलीय यंत्र अब कभी नहीं चल सकेंगे। इसके आसपास 19 से लेकर 102 मीटर तक ऊंची इमारतें जंतर-मंतर की चहारदीवारी से लेकर करीब 90 मीटर तक के दायरे में फैली हैं। इनमें आधा दर्जन इमारतें सरकारी हैं।

खगोलीय स्थापत्य की इस अद्भुत विरासत का इस तरह बेकार होना दुनिया के पुरातत्वविदों के लिए शोक का विषय है। दिल्ली सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दो साल पहले जंतर-मंतर को यूनेस्को की साझा विश्व विरासतों में शामिल कराने का प्रयास किया था, लेकिन सूर्य यंत्र पूरी तरह बेकार होने के कारण यूनेस्को ने दिल्ली का दावा खारिज कर दिया। सरकार ने इस सच्चाई को छिपा लिया।

सूत्रों के मुताबिक जंतर-मंतर के बेकार होने की आधिकारिक सूचना दरअसल हाल में ही संसद को दी गई। पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक सांसद के सवाल के जवाब में यह खुलासा किया कि 1724 में बने जंतर-मंतर के सूर्य यंत्रों को अब कभी रोशनी नहीं मिल सकेगी। हमारे खगोलीय ज्ञान का यह आश्चर्य अब एक मुर्दा इमारत है, जिसे 1982 के एशियाई खेलों का शुभंकर बनाया गया था।

जंतर-मंतर पर पुरातत्व सर्वेक्षण के दस्तावेज बताते हैं कि इसको घेरने वाली आठ इमारतों में दो नई दिल्ली नगर निगम [एनडीएमसी] की हैं जबकि एक-एक इमारत बैंक ऑफ बड़ौदा और स्टेट बैंक की है। शेष इमारतें निजी हैं। 102 मीटर सबसे ऊंची इमारत एनडीएमसी की पुरानी बिल्डिंग है। दरअसल सरकार ने 1992 में पहली बार यहां इमारतों के लिए नियम तय किए थे। जंतर-मंतर को घेरने वाली ज्यादातर इमारतें 1992 के पहले ही बन गई थीं। मगर अचरज यह है एनडीएमसी का दूसरा भवन और 14, जनपथ लेन की इमारत इस आदेश के बाद बनी। 14, जनपथ लेन की इमारत तो बगैर मंजूरी के बन गई जबकि एनडीएमसी की नई इमारत को विशेष मंजूरी दी गई। यही दोनों इमारतें जंतर-मंतर की धूप रोकने में सबसे आगे हैं।

जंतर-मंतर

-निर्माण: महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1724 में इसका निर्माण करवाया

-दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद शाह के लिए समय और नक्षत्रों का कैलेंडर इसी के जरिये बना

-इसमें 13 खगोलीय स्थापत्ययंत्र हैं

-सम्राट यंत्र: यह यंत्र सबसे बड़ा है। इसे सूर्य घड़ी भी कहते हैं। करीब 70 फुट ऊंचा, 114 फुट लंबा और दस फुट मोटी दीवारों वाले इस त्रिभुज यंत्र की मध्य भुजा पृथ्वी की धुरी के समांतर है और उत्तारी ध्रुव की तरफ इशारा करती है। त्रिभुज के दोनों तरफ घंटे, मिनट और सेकेंड की गणना के चिह्न बने हैं।

-जयप्रकाश यंत्र: बीच से खोखला यह गोलाकार यंत्र पृथ्वी के गोलार्धो पर आधारित है। इससे नक्षत्रों की स्थिति की गणना की जाती थी।

-मिश्र यंत्र: कहते हैं इसे जयसिंह ने नहीं बल्कि किसी अन्य खगोलशास्त्री ने बनाया था। यह यंत्र दुनिया के विभिन्न शहरों में दोपहर के समय की गणना देता है।

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