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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 19, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग: फैज़ अहमद फैज़ की याद में

By Kamal VermaEdited By:
Published: Sun, 19 Nov 2017 11:27 AM (IST)Updated: Mon, 20 Nov 2017 04:38 PM (IST)

फैज को याद करना ऐसे शायर को याद करना है जिसके यहां प्रेम और विद्रोह दोनों इस शिद्दत से मिलते ...और पढ़ें

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग: फैज़ अहमद फैज़ की याद में
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग: फैज़ अहमद फैज़ की याद में

नवनीत शर्मा

आज फैज अहमद फैज की पुण्यतिथि पर विशेष

मकाम फैज कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

मेहदी हसन की रेगिस्तानी खुरदराहट वाली आवाज में फैज अहमद फैज की मशहूर गजल 'गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले / चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले....'के इस शेर को याद करना फैज की शायरी के किवाड़ खोल लेने जैसा है। या महबूब की गली या फिर सूली। फैज को याद करना ऐसे शायर को याद करना है जिसके यहां प्रेम और विद्रोह दोनों इस शिद्दत से मिलते हैं कि प्रेम जिन कोनों को ढक लेता है, क्रांति का फैज यानी प्रकाश वहां तक पहुंचता है।

यह प्रश्न हमेशा से ज्वलंत रहा है कि शायर अपने साथ बीती को लिखे या फिर औरों के दुख को जीकर लिखे? फैज की शायरी इसी सवाल का जवाब देती प्रतीत होती है। गमेजहां का हिसाब करते हुए किसी का स्मरण हो आना या फिर यह कहना कि 'राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा....यह फैज का ही कमाल था। प्रेम हो या विद्रोह दोनों में संवेदनाओं की जरूरत होती है। इस हिसाब से फैज आज भी बड़े शायर हैं, अलग शायर हैं और रहेंगे भी।

यह तब है जब उनकी भाषा गालिब की तरह क्लासिक रचाव की भाषा है, परंपरागत टोन वाली भाषा है। लेकिन क्योंकि सार या विषयवस्तु बिलकुल आम आदमी के अहसास से जुड़ा है इसलिए फैज के प्रशंसक अब भी हैं। ऐसा बताया जाता रहा है कि जिस दिन सांडर्स को गोली मारी गई, उस दिन वह लाहौर में अपने हॉस्टल की छत पर थे। उसके बाद से वह भगत सिंह के मुरीद हो गए। कई लोगों का दावा है कि यह गजल उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को आदरांजलि के तौर पर कही थी जब फैज मिंटगुमरी जेल में कैद थे :

कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हाथ नहीं
सद शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

जिस धज से कोई मक्तल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है, इस जां की तो कोई बात नहीं

गर बाजी इश्क की बाजी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाजी मात नहीं

....फैज लाहौर के तो बाद में हुए, उससे पहले दिल्ली और अमृतसर के हैं। एक पत्रकार, संपादक, फौजी, शिक्षाविद् और क्रांतिकारी एक्टिविस्ट जैसे कई रूपों को बांधने वाला एक सूत्र था, उनका सामाजिक सरोकारों को महसूस करना और उनके बारे में बात करना। यही वजह थी कि फैज अपने बारे में बात करना बहुत कम पसंद करते थे।

उनका लिखा साहित्य खासतौर पर गज़़ल और नज्म के रूप में बाहर आया। परीखाने से लेकर बाजार में बिकते हुए मजदूर के गोश्त तक उनकी नजर इसीलिए जाती है क्योंकि वह रोजगार के गम तक भी पहुंचते हैं...वह जानते हैं कि क्यों एक वक्त ऐसा भी होता है जब शायर कह उठता है :

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा

पाकिस्तानी हकूमत द्वारा कई बार जेल भेजे गए फैज का यह शेर भी संभवत: पाकिस्तानी शासकों के लिए है :

वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है

इस दौरान उनकी बहुचर्चित रचना 'हम देखेंगे भी लिखी गई।

'नक्श-ए-फरियादी, 'दस्त-ए-सबा, 'जिंदांनामा, 'दस्त-ए-तहे-संग, 'मेरे दिल मेरे मुसाफिर, 'सर-ए-वादी-ए-सिना आदि संग्रहों के रचयिता फैज की हिंदी, अरबी, अंग्रेजी उर्दू और रूसी भाषाओं के भी जानकार थे। दरअस्ल मानवता के रहने तक प्रेम और विद्रोह के वातावरण भी बनते रहेंगे और जब जब तक यह सब रहेगा, फैज की शायरी भी प्रासंगिक रहेगी।

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-गम गुजार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफरेब हैं गम रोजगार के

वह बेशक आज हमारे बीच सशरीर न हों, साहित्य खासतौर पर गजल और नज्म से बाबस्तगी रखने वाली नई नस्ल उससे रोशनी ले रही है। उनकी जन्मशती 2011 में मनाई गई यानी फैज होते तो आने वाले फरवरी में एक सौ सात साल के होते।

फैज की एक नज्म

फिलिस्तीनी बच्चे के लिए लोरी

मत रो बच्चे
रो-रो के अभी
तेरी अम्मी की आंख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने गम से रुखसत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने खाब की तितली के पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराए देस गया है
मत रो बच्चे
तेरे आंगन में
मुर्दा सूरज नहला के गए हैं
चंद्रमा दफ्ना के गए हैं
मत रो बच्चे
अम्मी, अब्बा, बाजी, भाई
चांद और सूरज
रोएगा तो और भी तुझ को रुलवाएंगे
तू मुस्काएगा तो शायद
सारे इक दिन भेस बदल कर
तुझसे खेलने लौट आएंगे

 

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