Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    कोल्ड्रिफ कफ सीरप: 'मशीनें ही नहीं थीं तो जांच कैसे करते...', श्रीसन फार्मा की केमिकल एनालिस्ट का चौंकाने वाला कबूलनामा

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 10:21 PM (IST)

    मध्य प्रदेश में कोल्ड्रिफ कफ सीरप से बच्चों की मौत के मामले में श्रीसन फार्मा की केमिकल एनालिस्ट ने बताया कि फर्म में जरूरी मशीनें नहीं थीं, जिससे कच्चे माल की जांच नहीं हो पाती थी। जांच में सीरप में डायथिलीन ग्लायकाल (डीईजी) की मात्रा अधिक पाई गई, जिससे बच्चों की किडनी फेल हो गई। एसआईटी ने अब तक 10 लोगों को गिरफ्तार किया है।

    Hero Image

    कोल्ड्रिफ कफ सीरप। (फाइल)

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के तीन जिलों में विषाक्त कफ सीरप कोल्ड्रिफ से 24 बच्चों की मौत के मामले में गिरफ्तार श्रीसन फार्मास्युटिकल कंपनी की केमिकल एनालिस्ट के. माहेश्वरी ने चौंकाने वाली जानकारियां दी हैं। एसआइटी ने उसे दो दिन के लिए रिमांड पर लेकर पूछताछ की।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    उसने पुलिस को बताया कि यह सही है कि कच्चा माल और तैयार उत्पाद जांचने की जिम्मेदारी उसकी थी, पर फर्म में गुणवत्ता जांच के लिए अति आवश्यक गैस क्रोमैटोग्राफी मशीन तक नहीं थी। इस कारण कच्चे माल की जांच दवा बनाने के पहले नहीं हो पाती थी।

    पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कोल्ड्रिफ कफ सीरप बनाने के लिए उपयोग किए गए प्रोपेलीन ग्लायकाल की जांच दवा बनने के पहले कर ली जाती तो, पता चल जाता कि उसमें डायथिलीन ग्लायकाल (डीईजी) की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है। इससे बच्चों की जान बच जाती।

    बता दें कि तमिलनाडु औषधि प्रशासन की जांच रिपोर्ट में कोल्ड्रिफ में 48.6 प्रतिशत डीईजी मिला था, वहीं मप्र औषधि प्रशासन की जांच में डीईजी की मात्रा 46 प्रतिशत मिली, जो कि 0.1 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। ज्यादा डीईजी की वजह से ही बच्चों की किडनी फेल हुई और मौत हो गई। एसआइटी अब तक 10 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है।

    उल्लेखनीय है भारतीय औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के अनुसार केमिकल एनालिस्ट और क्वालिटी कंट्रोल एनालिस्ट दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी होती है कि वह कच्चा माल और तैयार उत्पाद दोनों की जांच करें। श्रीसन फार्मास्युटिकल में गुणवत्ता नियंत्रण एनालिस्ट खुद कंपनी का मालिक जी रंगनाथन था, जो पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

    गिरफ्तारी के बाद उसने खुद कोर्ट में कहा था कि फर्म में उसने गुणवत्ता से जुड़े काम बांटकर रखे थे, इस कारण उसे कुछ पता नहीं है। उसने यह नहीं बताया कि गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी उसी के पास थी। एसआइटी की जांच में पता चला कि लाइसेंस में उसी का नाम इस दायित्व के लिए दर्ज है।