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तक्षशिला-नालंदा की तरह फिर बनेगी पहचान?

Publish Date:Wed, 01 Apr 2015 10:34 AM (IST) | Updated Date:Wed, 01 Apr 2015 10:45 AM (IST)
तक्षशिला-नालंदा की तरह फिर बनेगी पहचान?
हम पिछले कई वर्षों से अपनी युवा आबादी और टैलेंट पर इतरा रहे हैं, लेकिन क्या कभी संसद-सरकार से लेकर हमारे शिक्षा और शोध संस्थानों में इस बात पर गंभीरता से सोचने और उस पर अमल करने की

हम पिछले कई वर्षों से अपनी युवा आबादी और टैलेंट पर इतरा रहे हैं, लेकिन क्या कभी संसद-सरकार से लेकर हमारे शिक्षा और शोध संस्थानों में इस बात पर गंभीरता से सोचने और उस पर अमल करने की जरूरत महसूस की जाती है कि आखिर हमारे शिक्षा संस्थान दुनिया के टॉप संस्थानों में क्यों शुमार नहीं हैं? बिहार और यूपी के स्कूलों में बोर्ड एग्जाम के दौरान जमकर होने वाली नकल की तस्वीरें पिछले दिनों दुनियाभर में देखी गईं। इसकी तारीफ की जाए या शर्मिंदा हुआ जाए? इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? क्या सिर्फ स्टूडेंट्स को दोषी करार दिया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इस स्थिति के लिए तो सबसे ज्यादा गार्जियन और टीचर ही जिम्मेदार हैं, जो अपने ही बच्चों-विद्यार्थियों को नाकारा बनाने पर आमादा हैं। जब इन बच्चों के और बड़े होने पर नौकरी नहीं मिलती, तो हम सरकार, व्यवस्था और भ्रष्टïाचार को कोसते हैं। तब हम यह बिल्कुल नहीं सोचते कि हमने अपने बच्चों को कितना काबिल बनाया है? यह किसी विडंबना से कम नहीं कि इतनी विशाल युवा आबादी वाला देश होने के बावजूद हमारी इंडस्ट्री हुनरमंद लोग न मिलने की चिंता पिछले कई वर्षों से जताती आ रही है। उधर, हम हैं जो बेरोजगारी का रोना रोते रहते हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों? क्या इस बेरोजगारी के लिए हम खुद जिम्मेदार नहीं? आखिर क्यों नहीं हम अपने बच्चों को बचपन से ही ईमानदारी व मेहनत से पढ़ाई करने और हुनरमंद होने के लिए बढ़ावा देते हैं। वे काबिल बनेंगे, तभी तो आत्मनिर्भर होकर अपनी पहचान बना सकेंगे।

दुनिया के टॉप शिक्षा संस्थानों में भारत के किसी संस्थान का नाम न होने की रिपोर्ट आए दिन हम सभी को शर्मसार करती है, पर हम हैं कि बदलना और बढऩा ही नहीं चाहते। आज से डेढ़-दो हजार साल पहले के तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में सिर्फ देश ही नहीं, दुनियाभर से स्टूडेंट पढऩे के लिए आते थे। इन संस्थानों को आज भी हम भुला नहीं पाते, लेकिन क्या कारण है कि आज तमाम संसाधनों के बावजूद उस गुणवत्ता के शिक्षा संस्थान हमारे यहां नहीं हैं। चंद आइआइएम और आइआइटी को छोड़ भी दें तो और कितने कॉलेज-विश्वविद्यालय हमारे यहां हैं, जो कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड, येल या एमआइटी के बराबर खड़े हो सकें। ऐसे वल्र्ड क्लास संस्थान न होने के कारण ही हमारे तमाम गार्जियन अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाने का सपना देखते हैं। एसोचैम की हाल की रिपोर्ट की मानें, तो भारतीय स्टूडेंट्स विदेश से पढऩे पर हर साल 6 से 7 अरब डॉलर खर्च कर रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह रकम बहुत ज्यादा है। अगर देश के शिक्षा संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने का पुरजोर प्रयास किया जाए, तो विपरीत धारा भी बह सकती है। इससे हमारे बच्चों को वल्र्ड क्लास एजुकेशन तो मिलेगा ही, इंडस्ट्री को भी मनमुताबिक स्किल्ड लोग मिल सकेंगे। तक्षशिक्षा-नालंदा की तरह तब फिर दूसरे देशों के स्टूडेंट्स भारत का रुख कर सकेंगे..., क्या हमारे नीति-नियंता इस दिशा में कारगर कदम उठाएंगे?

संपादक

दिलीप अवस्थी

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Web Title:Takshashila and Nalanda will identify again(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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