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    सांसद जाफरी हत्याकांड में फैसले की घड़ी

    By Bhupendra SinghEdited By:
    Updated: Thu, 02 Jun 2016 08:19 AM (IST)

    गुजरात के चर्चित गुलबर्ग सोसायटी हत्‍याकांड पर संभवतया गुरुवार को फैसला होगा। गोधरा में कारसेवकों को जलाने की घटना से उत्‍तेजित लोगों ने गुलबर्ग में पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों को मार डाला था।

    अहमदाबाद [शत्रुघ्न शर्मा]। 28 फरवरी 2002 को गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड में 69 लोगों के साथ मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी मूल रूप से मप्र के बुरहानपुर से थे। आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में वे सांसद चुने गए थे।

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    गुजरात के चर्चित गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड पर संभवतया गुरुवार को फैसला होगा। गोधरा में कारसेवकों को जलाने की घटना से उत्तेजित लोगों ने गुलबर्ग में पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों को मार डाला था। हत्याकांड से पहले अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त पी सी पांडे गुलबर्ग सोसायटी पहुंचकर पूर्व सांसद जाफरी से मिले व उनके परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की बात कही लेकिन सौसायटी के अन्य लोग भी जाफरी के घर आकर जमा हो गए इसलिए जाफरी ने उन लोगों को छोडकर जाने से इनकार कर दिया था, यह बात खुद म्रतक की पत्नी जकिया जाफरी ने कोर्ट को दिए बयान में कही थी।

    66 गिरफ़तार, 335 गवाह, 3000 दस्तावेज

    उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गठित स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम को गुलबर्ग सोसायटी सहित दंगों के 11 मामले जांच के लिए सौंपे गए थे। टीम ने इस हत्याकांड में 66 लोगों की धरपकड की, 335 गवाह व 3000 दस्तावेज पेश किए। स्पेशल कोर्ट के जज टी बी देसाई इसकी सुनवाई कर रहे हैं। जांच अधिकारी के जी एरडा ने पहली दफा इस मामले की एफआईआर दर्ज की। जाफरी के पुत्र तनवीर जाफरी अपने परिवार के साथ सूरत में रहते हैं, उन्होंने कहा कि 15 साल की लडाई के बाद फैसले की घडी आई है, न्याय मिले व दोषियों को सजा हो यही उम्मीद है।

    पीएम मोदी को मिली क्लीन चिट

    एसआईटी ने गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड मामले की गहन जांच के बाद अप्रेल 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेनद्र मोदी को यह कहते हुए क्लीन चिट दे दी थी कि इस घटनाक्रम में मोदी का कोई रोल ही नहीं था। इससे पहले पीडित पक्ष का कहना था कि मरने से पहले अहसान जाफरी अहमदाबाद पुलिस आयुक्त व सीएम ऑफिस में बचाने के लिए फोन करते रहे लेकिन कोई मदद नहीं मिली।

    बचाने वाले भी बन गए आरोपी

    गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड के दौरान कुछ लोग ऐसे भी थे जो मानवता की खातिर धर्म के भेदभाव को भुलाकर दूसरे धर्म के लोगों की जान बचाने में लगे थे। धर्मेश शुक्ला व कपिल मिश्रा ने कई मुस्लिम परिवारों की मदद की तथा कुछ महिलाओं व बच्चों को अपने घर में पनाह भी दी लेकिन 2008 में एसआईटी ने उनहें भी आरोपी बना जेल में धकेल दिया। इससे उनका कैरियर चौपट हो गया व परिवार बर्बाद हो गया। शुक्ला आज बेरोजगार होकर घूम रहा है, दंगा आरोपी के चलते विवाह नहीं हो पा रहा है जबकि दंगों के 6 माह पहले ब्याहे कपिल का तलाक हो गया। इन दोनों पर एक युवक की हत्या का आरोप है लेकिन मारे गए युवक के पिता अबु खान का कहना है कि उसने शुक्ला व मिश्रा को बेटे की हत्या करते नहीं देखा।