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    फ़िल्म समीक्षा: बंटवारे को लेकर एक अलग नजरिया देती है पार्टीशन 1947 (तीन स्टार)

    अगर आप बंटवारे को लेकर जानना चाहते हैं, समझना चाहते हैं तो 'पार्टीशन 1947' आपको एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

    By Hirendra JEdited By: Updated: Sat, 19 Aug 2017 05:12 AM (IST)
    फ़िल्म समीक्षा: बंटवारे को लेकर एक अलग नजरिया देती है पार्टीशन 1947 (तीन स्टार)

    -पराग छापेकर

    मुख्य कलाकार: हुमा कुरैशी, ह्यूज बोनविल, ओम पुरी, गिलिन एंडर्सन, मनीष दयाल, माइकल गैम्बोन, डेंजिल स्मिथ आदि।

    निर्देशक: गुरिंदर चड्ढा

    निर्माता: पॉल माएदा बर्ज़ेज़, गुरिंदर चड्ढा, दीपक नायर।

    भारत और पाकिस्तान का विभाजन मानव इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक है। जहां पुरखों से रहते आये वो ज़मीं, वो संस्कार, वो गलियां वो घर बार छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की तरफ़ शरणार्थियों की तरह जाने का ये सबसे बड़ा भयावह वक़्त था। मानवीय इतिहास में इस तरह की बड़ी त्रासदी संभवतः और कोई नहीं है। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख सभी उस भीड़ की बर्बरता का शिकार हुए। खून की नदियां दोनों तरफ़ बह रही थीं।

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    इस भीषण इतिहास पर वैसे तो 'गरम हवा', 'सरदार', 'अर्श', 'ए ट्रेन टू पकिस्तान', 'पिंजर' जैसी कई फ़िल्में बनीं जिसमें विभाजन के समय हुई मानवता की हत्या, मनुष्य से पशु और पशु से मनुष्य बनने की दिल दहलाने वाले चित्र सामने आये। मगर, गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म 'पार्टीशन 1947' में टेबल का दूसरा हिस्सा बताया गया है। डोमिनिक लेपियर की किताब 'फ्रीडम एट मिड नाईट को आधार बनाकर गुरिंदर ने इतिहास के उन अंधेरों पर रौशनी डालने की कोशिश की है कि आख़िर विभाजन के पीछे क्या राज़ था? क्या विभाजन टाला नहीं जा सकता था? अंग्रेजों की मंशा क्या थी? ऐसे कई सवालों के जवाब फ़िल्म में मिलते हैं।

    समय की कमी और इतना मुश्किल काम जल्द करने में असमर्थ रेडक्लिफ़ अपने हाथ खड़े कर देते हैं। ऐसे में विंस्टन चर्चिल की एक गोपनीय फ़ाइल उन्हें दी जाती है, जिसमें बंटवारा कैसे होगा, लकीर कैसे खिंची जायेगी सब लिखा हुआ है। और अंततः चर्चिल का मकसद समझ में आता है कि बंटवारे से अंग्रेज़ों का फ़ायदा ये है कि रूस को और भारत को अरब के तेल से दूर रखा जा सके। ये राज जानकर माउंटबेटन ख़ुद को असहाय और ठगा सा महसूस करते हैं। और इस अपराधबोध के साथ विस्थापितों की सेवा में जुट जाते हैं।

    फ़िल्म हिन्दुस्तान के आखिरी वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन के दृष्टिकोण से है। वो भारत आते हैं और यहां की स्तिथियों को नियंत्रण में करने की कोशिश करते हैं। इसमें उनका साथ उनकी पत्नी एडविना भी देती है। मगर दंगों से जलते देश में नेहरु और जिन्ना इस बात से सहमत नज़र आते हैं कि हिंसा का अंत बंटवारे के साथ हो जाएगा। एक बड़ी एक्सरसाइज़ की जाती है और अंततः माउंटबेटन बंटवारे का प्लान बनाते हैं। इस काम को अंजाम देने के लिए रेडक्लिफ को बुलाया जाता है जो पहली बार हिन्दुस्तान आये थे।

    फ़िल्म वाइसरॉय के घर में ज्यादा होने के कारण नैरेटिव ज़्यादा हो गयी है। जो कभी-कभी फ़िल्म को उबाऊ कर देता है। डबिंग में भावनाओं की कमी लगती है। पर इस भयावह बैकड्राप में जीत कुमार (मनीष दयाल) और आलिया (हुमा कुरैशी) की प्रेमकथा को जिस तरह से गुरिंदर चड्ढा ने पिरोया है वो पकड़ बनाये रखने में काफी मददगार साबित होती है।

    यह भी पढ़ें: फिल्म रिव्यू: पार्टीशन:1947 

    अभिनय की बात करें तो मनीष दयाल और हुमा ने सशक्त अभिनय किया है। ह्यूज बोनविल ने भी अपने किरदार को बखूबी निभाया है। ओम पूरी की संभवतः ये आख़िरी फ़िल्म होगी। कुल मिलाकर पार्टीशन हमारे दौर की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म तो है मगर इसका नज़रिया कहीं न कहीं एकतरफा लगता है। फ़िल्म के क्राफ्ट के हिसाब से कई सारी जगह सिंथेटिक लगती है। मगर, फिर भी अगर आप बंटवारे को लेकर जानना चाहते हैं, समझना चाहते हैं तो 'पार्टीशन 1947' आपको एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

    जागरण डॉट कॉम रेटिंग: 5 में से 3 (तीन) स्टार

    अवधि: 1 घंटा 46 मिनट