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    फिल्‍म रिव्‍यू: 'जुनूनियत', प्यार व सुरक्षित भविष्य का द्वंद्व(3 स्‍टार)

    By Tilak RajEdited By:
    Updated: Fri, 24 Jun 2016 03:12 PM (IST)

    आम तौर पर प्रेम कहानियों में जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी की दीवार आड़े आती है। जुनूनियत में सामाजिक मुद्दे जोड़े गए हैं। यह मुद्दा सभ्य समाज के रवैये पर सवाल उठाता है।

    -स्मिता श्रीवास्तव

    मुख्य कलाकार- पुलकित सम्राट, यामी गौतम और तरण बजाज।
    निर्देशक- विवेक अग्निहोत्री
    संगीत निर्देशक- अंकित तिवारी, मीत बद्रर्स और जीत गांगुली।
    स्टार- 3 स्टार

    निर्देशक विवेक अग्निहोत्री अलग-अलग जॉनर की फिल्में बना रहे हैं। बीते दिनों उनकी फिल्म ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ आई थी। वह बौद्धक आतंकवाद पर आधारित थी। अब उन्होंने रोमांटिक फिल्म ‘जुनूनियत’ बनाई है। यह विशुद्ध प्रेम कहानी है।

    आम तौर पर प्रेम कहानियों में जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी की दीवार आड़े आती है। जुनूनियत में सामाजिक मुद्दे जोड़े गए हैं। यह मुद्दा सभ्य समाज के रवैये पर सवाल उठाता है। हमारे सैनिक देश रक्षा की खातिर बर्फीली पहाडिय़ों पर मुस्तैदी से तैनात रहते हैं। मौका पडऩे पर वे हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर देते हैं। बात जब उनकी शादी की आती है तो माता-पिता को बेटी के भविष्य की चिंता सताने लगती है। उन्हें लगता है कि कहीं सैनिक साथ ब्याहने पर उनकी बेटियों की खुशियां सिर्फ चंद दिनों की मोहताज बनकर न रह जाए। जुनूनियत में यह मुद्दा बारीकी से उठाया गया है।

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    कैप्टन जहान बख्शी (पुलकित सम्राट) सोनमर्ग की बर्फीली वादियों में तैनात है। उसका मिजाज शायराना है। वह अपनी किस्मत खुद लिखने में यकीन रखता है। अमृतसर की सुहानी (यामी गौतम) उसकी जिंदगी में आती है। दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठते है। सुहानी के परिवार में बड़े ताऊ, ताऊ और भाई सेना में रहते हुए शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सुहानी के पिता इस प्यार को कबूल नहीं करते। यह अड़चन कहानी में कई मोड़ भी लाती हैं। शादी की बुनियाद सुरक्षित भविष्यक पर टिकी होनी चाहिए, यह फिल्म इस सवाल को भी कुरेदती है।

    फिल्म कई मुद्दों से सीधे टकराती है और उन्हें सामयिक परिप्रेक्ष्य में रखती है। पिता की आशंकाओं को लेकर उनके मन में चल रहे अंतद्वंद्व को उबारने में थोड़ी कसर नजर आती है। कहानी बीच में थोड़ी सी बोझिल लगती है, मगर बाद में अपनी कसावट से बांधने में कामयाब रहती है। विवेक अग्निहोत्री ने रियल लोकशन का खूबसूरती से इस्तेअमाल किया है। उन्होंंने कश्मी र, अमृतसर, श्रीनगर और पटियाला में किरदारों के आवागमन को लेकर सावधानी बरती है।

    पंजाब के जिक्र में वहां होने वाली आलीशान शादी, लजीज पकवान और भांगड़ा जरूर शामिल होता है। फिल्मप में उन्हें भी जगह मिली है। अंग्रेजी में दुल्ह न को ब्राइड न बुलाकर स्वनदेशी भाषा में परजाई बुलाने की जरुरत युवा पीढ़ी को जड़ों की ओर ले जाती हैं। कई सीन की बुनावट आपको परिवार की नसीहतें भी याद दिला देगी।

    पिता की भूमिका को रवि खेमू ने जस्टिफाई किया है। यामी गौतम ने किरदार को बखूबी परिभाषित किया है। भावों को व्यक्त करने में पुलकित सम्राट कहीं-कहीं फिसले हैं। भाभी की भूमिका में ह्रषिता भट्ट ने दिए गए दृश्यों को अपनी योग्यता से सार्थक किया है। एक विशेष भूमिका में गुलशन देवैया भी हैं। फिल्म के गीत-संगीत पर काफी मेहनत की गई है। गीतकार मनोज मुंतजिर व कुमार के बोलों को उम्दा बनाने में मीत ब्रर्द्स, जीत गांगुली और अंकित तिवारी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।

    अवधि- 129 मिनट