संसदीय सचिव पद का विवादों से गहरा नाता, क्या है फसाद की जड़ - पढ़ें खबर
आखिर केजरीवाल ने किस दहलीज को लांघा जिसके चलते दिल्ली का सियासी पारा अचानक उबल गया। मुख्यमंत्री ने दिल्ली में कौन सा कानून तोड़ा और उनके पहलेे किस पार्टी ने उस कानून को तोड़ा।
नई दिल्ली । आखिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कौन सी लक्ष्मण रेखा लांघी, जिसके बाद दिल्ली में सियासी तुफान खड़ा हो गया। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने आप को चारों तरफ से हमले शुरू कर दिए।
आखिर वह कौन सा संवैधानिक प्रावधान है, जिस पर दिल्ली की सियासत उबाल ले रही है। क्या आप उस प्रावधान को जानते हैं, जिस पर दिल्ली सरकार को भाजपा और कांग्रेस ने मिलकर हल्ला बोल रखा है। क्या है उस कानून के प्रावधान ? क्या सच में दिल्ली सरकार ने इतना कसूर किया है कि लोगों ने हायतौबा मचा रखा है। पढ़ें खबर।
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आखिर क्या है मामला
संविधान के अनुच्छेद 164 1ए के तहत राज्यों में मंत्रियों की संख्या को सुनिश्चित करता है। संविधान में यह प्रावधान है कि राज्य में कुल विधानसभा सदस्यों की संख्या के 15 फीसद लोगों को ही मंत्री बनाया जा सकता है। चूंकि किसी राज्य में संसदीय सचिव का दर्जा राज्य मंत्री के बराबर होता है, इसलिए कई उच्च अदालतों ने इसके खिलाफ फैसला दिया है।
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हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया
वर्ष 2015 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में 24 संसदीय सचिवों की नियुक्ति को अवैध करार दिया था। इसी क्रम में तेलंगाना राज्य में संसदीय सचिव के पद को हैदराबाद हाईकोर्ट ने असंवैधानिक कहा। इसी तरह का फैसला वर्ष 2009 में गोवा का है, जहां दो संसदीय सचिवों की नियुक्ति को भी असंवैधानिक करार दिया गया। वर्ष 2005 में हिमाचल प्रदेश की हाईकोर्ट ने भी प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्ति आठ संसदीय सचिव को अवैध कहा।
दिल्ली में क्या है प्रावधान
दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली बनने के बाद इसके लिए अलग से प्रावधान किया गया। संविधान के अनुच्छेद 239 (AA) के तहत दिल्ली सरकार में मंत्रियों की संख्या कुल विधानसभा सदस्यों के दस फीसद सुनिश्चित की गई है। इसमें यह भी प्रावधान है कि मुख्यमंत्री एक व्यक्ति को संसदीय सचिव नियुक्ति कर सकता है।
क्या है लाभ का पद
संसदीय सचिव पर उठे विवाद के कारण एक बार फिर राजनीति में लाभ का पद का मामला सुर्खियों में है। इस पर बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां भाजपा और कांग्रेस ने आप के विधायकों पर लाभ के पद का उल्लंंघन करार दिया है, वहीं आप का दावा है कि उसके 21 विधायक बिना किसी वेतन या भत्ते के इस पद पर काम कर रहेे हैंं। हालांकि संविधान में लाभ के पद को परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन निर्वाचन आयोग ने सरकार में लाभ के पद मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था दी है। लाभ के पद को इस प्रकार से टेस्ट किया जा सकता है।
1- उसकी नियुक्ति का प्राधिकाार सरकार के पास सुनिश्चित हो।
2- सरकार के पास उसे हटाने या खारिज करने का प्राधिकार हो।
3- उक्त नियोक्ता का भत्ता या वेतन सरकार द्वारा देना सुनिश्चित हो।
4- सरकार का उसके कर्तव्यों के विस्तार या अधिकारों पर नियंत्रण हो।
बता दें कि संसदीय सचिव मामले में दिल्ली सरकार को भाजपा और कांग्रेस दोनों बड़ी पार्टियों ने जमकर हमला बोला है। ऐसे में मुख्यमंत्री अरिवंद केजरीवाल ने दोनों दलों को आइना दिखाते हुए कहा है कि यही काम जब सत्ता में करते हैं तो वह वैध है और जब हमारी सरकार ने किया तो हमें अवैध करार दिया गया। उन्होंने प्रहार करते हुए कहा कि इससे यह साबित होता है कि केंद्र सरकार आम आदमी पार्टी से भयभीत है।
मुफ्त में काम कर रहे हैं MLA
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमने अपने विधायकों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी हैं, लेकिन वे मुफ्त में काम कर रहे हैं। हमें लगा कि कई विधायक ऐसे हैं जो काफी क्वालिफाइड हैं, पढ़े-लिखे हैं, इसलिए उनकी काबिलियत का इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक एमएलए को कहा कि आप स्कूल का काम भी देखा करो। एक को कहा कि आप अस्पताल का काम भी देखा करो। एक को सड़क का, एक को बिजली का, एक को पानी का एक्स्ट्रा काम दिया। उन एमएलए को हम एक पैसा नहीं दे रहे हैं।’ हमने एक नई परंपरा कायम की है, हमने दिल्ली की जनता के हित में यह काम किया, लेकिन विपक्ष को यह भी नहीं पच रहा है।
उन्होंनेे एक बार फिर इस मसले पर जारी नोटिफिकेशन का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें साफ लिखा गया है कि संसदीय सचिवों को न तो कोई तन्खवाह मिलेगी, न सुविधा। वे मुफ्त में काम करेंगे। अगर कोई एमएलए फ्री में स्कूलों का, अस्पतालों का, बिजली का, पानी का काम कर रहा है तो मोदी जी को क्या दिक्कत है।
कहां कितने संसदीय सचिव
1- नगालैंड : 24
2- हिमाचल : 6
3- राजस्थान : 5
4- पंजाब : 24
5- गुजरात : 5
इसके अलावा हरियाणा, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी में संसदीय सचिव हैं। कई जगहों पर संसदीय सचिवों को वेतन और लाल बत्ती की सुविधा भी प्राप्त है।
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