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    'बलूचिस्तान में सेना तैनात कर सकता है चीन', बलूच नेता का दावा; भारत के लिए गंभीर खतरा

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 07:00 AM (IST)

    बलूच नेता मीर यार बलूच ने दावा किया है कि चीन अगले कुछ महीनों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में अपनी सेना तैनात कर सकता है। यह भारत के लिए खतरा ...और पढ़ें

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    बलूच नेता मीर यार ने जयशंकर को लिखा पत्र, कहा-यह भारत के लिए खतरा (फोटो-एक्स)

    एएनआइ, क्वेटा। बलूच नेता मीर यार बलूच ने दावा किया है कि चीन अगले कुछ महीनों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में अपनी सेना तैनात कर सकता है। यह भारत के लिए खतरा हो सकता है। उन्होंने इस बात को लेकर आगाह किया है कि चीन-पाकिस्तान के बढ़ते गठबंधन से गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

    बलूच ने यह बात नए साल के मौके पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के नाम लिखे एक खुले पत्र में कही है। बलूच ने गत मई में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और गुलाम जम्मू-कश्मीर में आतंकी ठिकानों के निशाना बनाने के भारत के कदम की सराहना भी की है।

    मानवाधिकार कार्यकर्ता मीर यार ने अपने इस पत्र को एक्स पर साझा किया है और कहा है कि बलूच प्रतिनिधि इस्लामाबाद और बीजिंग के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को खतरनाक मानते हैं।

    उन्होंने लिखा, 'बलूचिस्तान के लोग पिछले 79 वर्षों से पाकिस्तान के कब्जे, सरकार प्रायोजित आतंकवाद और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का सामना कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि इस रोग को जड़ से खत्म किया जाए, ताकि हमारे राष्ट्र के लिए स्थायी शांति और संप्रभुता सुनिश्चित की जा सके।'

    पत्र में मीर ने बताया कि चीन और पाकिस्तान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के अंतिम चरणों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह चीनी राष्ट्रपति शी चिन¨फग की बेल्ट और रोड इनिशिएटिव परियोजना है, जो बलूचिस्तान से होकर गुजरती है।

    उन्होंने दावा किया कि अगर बलूच प्रतिरोध और रक्षा बलों को मजबूत नहीं किया गया और इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया तो क्षेत्र जल्द ही चीनी सैन्य बलों की मौजूदगी का गवाह बन सकता है। ऐसा होने पर व्यापक क्षेत्रीय परिणाम होंगे।

    मीर ने कहा, छह करोड़ बलूच लोगों की इच्छा के बिना बलूचिस्तान में चीनी सैनिकों की तैनाती भारत और इस क्षेत्र के भविष्य के लिए अकल्पनीय खतरा और चुनौती पेश करेगी।'

    चीन और पाकिस्तान सीपीईसी के तहत सैन्य विस्तार के आरोपों से कई बार इन्कार कर चुके हैं कहा है कि यह परियोजना आर्थिक प्रकृति की है। जबकि भारत इस परियोजना का विरोध करता है, क्योंकि यह गुलाम जम्मू-कश्मीर से होकर गुजरती है।