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    'बांग्लादेश में लाएंगे तालिबान राज', कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के नेता का दावा; यूनुस सरकार पर उठ रहे सवाल

    Updated: Fri, 04 Jul 2025 02:00 AM (IST)

    बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान कट्टरपंथी गतिविधियां बढ़ने की खबरें हैं। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन बांग्लादेश को तालिबान राज का मॉडल बनाने की बात कर रहे हैं। अवामी लीग के अनुसार जमात चार मोनाई गठबंधन खुलेआम यह बात कह रहा है। एक नेता ने शरिया कानून लागू करने और अफगान मॉडल का पालन करने की बात कही है।

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    इस्लामिक मूवमेंट के नेता मोहम्मद फैजुल करीम ने इस्लामी शासन के लिए खाका प्रस्तुत किया (फोटो: रॉयटर्स)

    आईएएनएस, ढाका। बांग्लादेश में मोहम्म्द यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में कट्टरपंथी गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। वे अब खुलेआम यह बात कह रहे हैं कि वे बांग्लादेश को तालिबान राज का मॉडल बनाना चाहते हैं।

    अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और रोजगार के अलावा उनके अकेले घर से निकलने तक पर प्रतिबंध लगा रखे हैं। अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कटौती करने के अलावा जिहादी प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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    कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों का बोलबाला

    अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग ने गुरुवार को बताया कि कट्टरपंथी इस्लामी संगठन जमात चार मोनाई गठबंधन खुलेआम बांग्लादेश को तालिबान राज का मॉडल बनाने की बात कह रहा है। लीग ने बताया कि अमेरिका स्थित बांग्लादेशी पत्रकार खालिद मुहीउद्दीन को दिए इंटरव्यू में इस्लामिक मूवमेंट के नेता मोहम्मद फैजुल करीम ने इस्लामी शासन के लिए खाका प्रस्तुत किया।

    मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में बढ़ते कट्टरपंथ के बीच यह बात सामने आई है। करीम ने जोर देकर कहा कि अगर वे राष्ट्रीय चुनाव जीतकर सत्ता में आते हैं तो बांग्लादेश में शरिया कानून लागू किया जाएगा। अफगानिस्तान के वर्तमान शासन प्रणाली का पालन किया जाएगा।

    जबरन गायब करने के मामले की जांच

    • समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, बांग्लादेश की सेना ने गुरुवार को कहा कि उसने उस आरोप की जांच शुरू कर दी है, जिसमें यह कहा गया कि कुछ सैनिक लोगों को जबरन गायब करने में शामिल थे। जांच में दोषी पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।
    • इधर, अंतरिम सरकार में पत्रकारों को प्रताड़ित करने के मामले बढ़ गए हैं। देश के 88 पत्रकारों, लेखकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समूह ने इस पर गहरी चिंता जताई है।

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