नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। दुनिया के नक्शे पर एक शहर है यरुशलम, जिसे इजरायल अपनी अविभाजित राजधानी मानता है। वहीं, फिलिस्तीन पूर्वी यरुशलम को अपनी राजधानी मानता है। यह शहर ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों के लिए जितना बड़ा आस्था का केंद्र है, उतना ही विश्व की राजनीति और कूटनीति में यह एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुनिया की सियासत में यह शहर इतना संवेदनशील है कि इससे जुड़े एक फैसले से पूरी दुनिया हिल जाती है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल दिसम्बर में यरुशलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता दे दी और वहां पर एक अंतरिम दूतावास खोल दिया। इस फैसले से अरब देश बौखला गए। दुनिया भर में ट्रंप के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन होने लगे। ट्रंप के इस फैसले के बाद 17 दिसंबर 2017 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 सदस्यों में से अमेरिका के मित्र देशों ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान और यूक्रेन समेत 14 देशों ने ट्रंप के फैसले को खारिज करने के फैसले का समर्थन किया। इस पर दुनिया में अलग-थलग पड़ते देख अमेरिका ने वीटो कर दिया। फिर 21 दिसंबर 2017 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में 128 देशों ने अमेरिका के खिलाफ वोट किया और यरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने से इनकार कर दिया।

दरअसल यरुशलम के इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो विवाद की असल जड़ समझ में आती है। अग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के बाद फिलिस्तीन के एक हिस्से को अलग करके 1948 में इजरायल बना। यरुशलम के पश्चिमी हिस्से में इजरायल की संसद बनी। शहर का पूर्वी हिस्सा फिलिस्तीन के पास था, लेकिन 1967 के युद्ध में इजरायल ने पूर्वी यरुशलम पर कब्जा कर लिया। तब से यह इजरायल के पास है, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली। यरुशलम के पूर्वी हिस्से में है प्राचीन शहर, जहां पर ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों की आस्था के केंद्र हैं और यहीं से शुरू होता है विवाद। फिलिस्तीन पूर्वी यरुशलम को और इजरायल पूरे यरुशलम को अपनी राजधानी मानता है। इस विवाद को समझने के लिए धार्मिक पहलू को जानना भी जरूरी है।

यरुशलम एक ऐसा शहर है जो सदियों से ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों के दिल में बसा हुआ है। ये दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है। ये ऐसा शहर है, जिस पर कई बार आक्रमण हुए। इसे जीता गया। ये तबाहहुआ, लेकिन फिर से उठ खड़ा हुआ। पुराने समय में कई शासकों ने इस शहर पर राज किया और इन्हीं में से एक शासक सिकंदर भी थे। सिकंदर ने भी इस शहर को युद्ध से जीता था और यहां अपने राज्य की स्थापना की थी। वहीं इस शहर पर ऑटोमन साम्राज्य का भी शासन रहा है।

इस शहर का हर ज़र्रा इसे इसके अतीत से जोड़ता है। हालांकि, ज़्यादातर कहानियां इसके बंटवारे और अलग-अलग धर्मों के टकराव और संघर्ष से भरी हुई हैं। इसके बावजूद सभी धर्म इस पवित्र शहर का सम्मान करने में एक साथ हैं। दरअसल, यरुशलम की आत्मा पुराने शहर में है। ये चारों ओर पत्थर की दीवारों से घिरा है और यहां कुछ ऐसी जगहें हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे पवित्र स्थलों में शुमार किया जाता है।

मुस्लिम धर्म की आस्था
यरुशलम में मुसलमानों की पवित्र 'अल-अक्सा' मस्जिद है। इस मस्जिद को मुस्लिम धर्म के मक्का मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। इतिहास के अनुसार यहां पैगंबर मोहम्मद साहब मक्का से एक रात में पहुंच गए थे और यहां पैगंबरों की आत्माओं के साथ चर्चा की थी। फिर उन्होंने अपनी आखरी सांस भी यहां ली थी। रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान हर शुक्रवार को लाखों मुस्लिम यहां नमाज़ पढ़ने पहुंचते हैं।

यहूदी धर्म की आस्था
यहूदी धर्म में इस जगह का काफी महत्व है और इस धर्म के लोगों का मानना है कि यरुशलम धरती का केंद्र है। यही वजह है कि यहां खुदा का निवास है। यहीं पर पैगंबर इब्राहिम ने अपने बेटे इश्हाक की बलि देने की तैयारी की थी। इस जगह पर ही राजा सोलोमन ने 'टेम्पल माउंट' का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को 580 ईसा पूर्व में बेबीलोनियन ने हमला कर तोड़ दिया था।

ईसाई धर्म की आस्था
ईसाइयों के लिए भी येरुशलम एक पवित्र स्थान के समान है। ईसाइयों का मानना है कि इसी जगह से उनका धर्म पूरी दुनिया में फैला था। प्रभु ईसा मसीह को उनके माता-पिता बादशाह हेरोद के सैनिकों से बचा कर यहीं लाए थे। यहीं ईसा ने सभी चमत्कार दिखाए थे और अपने उपदेश दिए थे। ये वही शहर है जहां उनको कैद कर रखा गया था और सूली पर चढ़ाया गया था।

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Posted By: Amit Singh

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