नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। हनोई में अमेरिकी राष्‍ट्रपति और उत्तर कोरिया के बीच वार्ता के विफल होने के बाद स्थितियां लगातार बदल रही हैं। बदलते घटनाक्रम में अमेरिका ने वार्ता के बाद पहली बार उत्तर कोरिया की तरफ कड़ा रुख करते हुए नए प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के दायरे में इस बार सिर्फ उत्तर कोरिया ही नहीं है बल्कि चीन की दो कंपनियां भी आई हैं। इन दोनों कंपनियों पर प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया को मदद पहुंचाने का आरोप है। अमेरिका का कहना है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र और अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगाने के बावजूद कंपनियों ने किम की मदद की है।

ट्रंप प्रशासन ने क्‍या कहा
ताजे प्रतिबंधों को लेकर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वह इसके जरिए उत्तर कोरिया को आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है। अमेरिका का कहना है कि वह सिर्फ इस बात को सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम की तरफ आगे न बढ़े। इसके अलावा वह यह भी चाहता है कि प्रतिबंधों का पूरी तरह से पालन किया जाए, यह सभी देशों पर समान तरह से लागू होता है। हालांकि इन प्रतिबंधों के बाद एक बार फिर से कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढ़ने की आशंका दिखाई दे रही है।

हनोई वार्ता के विफल होने की वजह
आपको बता दें कि हनोई में हुई वार्ता के विफल होने के पीछे सबसे बड़ी वजह यही थी कि किम चाहते थे कि अमेरिका अपने प्रतिबंध हटा ले। लेकिन ट्रंप इस पर राजी नहीं हुए और वार्ता बीच में ही छोड़कर चले गए। तभी से माना जा रहा था कि इसकी विफलता का खामियाजा कहीं न कहीं उत्तर कोरिया भुगतना पड़ेगा। वही अब देखने को मिल भी रहा है।

परमाणु कार्यक्रम बंद न करना बड़ा कारण
इन प्रतिबंधों के पीछे सिर्फ हनोई वार्ता की विफलता ही नहीं है बल्कि कुछ और भी कारण हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु कार्यक्रम को लगातार चालू रखना है। हनाई वार्ता और उससे पहले वर्ष 2018 में हुई सिंगापुर वार्ता के दौरान अमेरिकी सेटेलाइट ने इस बात का खुलासा किया था कि उत्तर कोरिया ने वार्ता के लिए हरी झंडी देने के बाद भी परमाणु कार्यक्रम को बंद नहीं किया है। इसकी वजह से वार्ता की शुरुआत में ही कुछ सवाल खड़े हो गए थे। लेकिन यदि सिंगापुर वार्ता की बात करें तो उसमें अमेरिका और उत्तर कोरिया आगे बढ़ने के लिए काफी कुछ करते दिखाई दिए थे, जो हनोई में नहीं दिखाई दिया।

उत्तर कोरिया की मांग नहीं होगी पूरी
प्रतिबंधों के साथ अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि वह उत्तर कोरिया की मांगों को पूरा नहीं करेगा। ट्रंप प्रशासन ने चीन की कंपनियों को भी सख्‍त हिदायत दी है। अमेरिका ने यह भी साफ कर दिया है कि न सिर्फ उत्तर कोरिया बल्कि चीन भी इसको लेकर खतरे के दायरे में है। चीन की कंपनियां चाहे वह शिपिंग इंडस्‍ट्री से जुड़ी हों या फिर फाइनेंस से सभी पर उत्तर कोरिया से मदद के एवज में प्रतिबंध का खतरा मंडरा रहा है। ट्रंप के नेशनल सिक्‍योरिटी एडवाइजर ने भी साफ कर दिया है कि हर किसी को यह सुनिश्चित कर देना होगा कि वह उत्तर कोरिया की किसी भी तरह से मदद नहीं करेगा।

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Posted By: Kamal Verma

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