नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। भारत की मजबूत आस्थाएं और वैदिक संस्कृति देश के अंदर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की दिशा और दशा तय करती है। यही वजह है कि भारत ने अमेरिका के एक बड़े मुनाफे वाले व्यापार को ठेंगा दिखा दिया है। भारत ने अमेरिका को साफ कह दिया है कि वह देश की सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनाओं पर कोई समझौता नहीं कर सकता है। भारत के इस फैसले से अमेरिका को तगड़ा झटका लगा है, जिसके बाद उसने भारत को व्यापार में तरजीह देने वाले देशों की सूची से निकाल दिया है।

यहां हम बात कर रहे हैं डेयरी उत्पादों के व्यापार की। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या होने के कारण भारत में डेयरी उत्पादों की भारी मांग रहती है। लिहाजा, अमेरिका चाहता है कि भारत उससे डेयरी उत्पाद खरीदे, लेकिन भारत आस्था और संस्कृति का हवाला देकर अमेरिका को साफ मना कर चुका है। माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी वजह से भारत को व्यापार में तरजीह देने वाले देशों की सूची से निकाल दिया है।

भारत पर प्रतिबंध लगाने से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में कहा था कि भारत सरकार के साथ काफी चर्चा के बाद वह ये कदम उठा रहे हैं। इसकी वजह ये है कि भारत ने अब तक अमेरिका को इस बात का आश्वासन नहीं दिया है कि वो अपने बाजारों तक अमेरिका को उसी तरह से समान और उचित पहुंच देगा जैसा कि वह भारत के देता है। भारत जब तक अमेरिका की व्यापार में तरजीह देने वाली सूची में शामिल था, वह 5.6 बिलियन डॉलर (लगभग 392 अरब रुपये) का सामान अमेरिकी बाजारों में बिना किसी आयात शुल्क के पहुंचाता था।

इसलिए भारत ने अमेरिका को कहा ना
भारत द्वारा अमेरिका को डेयरी उत्पाद के व्यापार से मना करने की खास वजह है, जो भारतीयों की आस्था और संस्कृति से जुड़ी हुई है। दरअसल, अमेरिका समेत यूरोप के कई देशों में गायों को चारे में ‘ब्लड मील’ दिया जाता है। ब्लड मील में गाय, सूअर और भेड़ का मांस व खून मिलाया जाता है। ब्लड मील खाने वाली गायों के दूध से बने डेयरी उत्पादों को लेकर भारत क रुख स्पष्ट है। भारत ने अमेरिका को दो टूक कह दिया है कि वह ऐसी गायों के दूध से बने डेयरी उत्पाद नहीं खरीद सकता, जिन्हें ब्लड मील दिया जाता हो।

भारत ने अमेरिका को भी बताई वजह
भारत सरकार के अनुसार उसने अमेरिका को वजह बता दी है कि वह क्यों उसने डेयरी उत्पाद नहीं ले सकता है। भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है ‘भारत ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है कि सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के अनुसार आयात किए जाने वाले डेयरी उत्पाद उन जानवरों के दूध से बने होने चाहिए जिन्हें कभी भी ब्लड मील न दिया गया हो मतलब वह मांसाहारी न हों।’ भारत ने अमेरिका से कहा है कि अगर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में इस शर्त का पालन होता है तो उन्हें डेयरी उत्पाद खरीदने में कोई आपत्ति नहीं है। भारत ने अमेरिका को भी स्पष्ट तौर पर बता दिया है कि ये शर्त देश की सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी है, जिस पर किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता।

ऐसे तैयार होता है गायों के लिए ‘ब्लड मील’
‘ब्लड मील’ को दूसरे जानवरों को खिलाने के लिए ही तैयार किया जाता है। ये मीट पैकिंग व्यवसाय का बाई-प्रोडक्ट है। इस प्रक्रिया में जानवरों और विशेषकर गौवंश को मारकर उनका खून जमा कर लिया जाता है। इसके बाद उस खून को धूप या हीटर की मदद से सुखाकर गायों के लिए विशेष तरह का चारा तैयार किया जाता है, जिसे ‘ब्लड मील’ कहा जाता है। माना जाता है कि इससे गाय को दूध देने के लिए जरूरी एमिनो एसिड (लाइसीन) मिलता है। इसे खाने से दुधारु पशु का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वह ज्यादा दूध देती है। इस वजह से अमेरिका और यूरोप में गायों के चारे में ब्लड मील का इस्तेमाल किया जाता है।

गाय को पूजनीय मानते हैं भारतीय
मालूम हो कि भारत में गाय को पूजनीय माना जाता है। हिंदू समेत अन्य धर्मों में गाय की पूजा की जाती है। भारत में गौमांस खाना प्रतिबंधित है और ये एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ही यहां लोग गायों के चारे में मांस वाला भोजन नहीं मिलाते हैं। गाय के अलावा अन्य दुधारू पशुओं को भी भारत में सम्मानित स्थान दिया गया है। ऐसे में ब्लड मील खाने वाली गायों के डेयरी उत्पाद भारत में आने से लोगों की भावनाएं आहत होने का खतरा है। इसलिए सरकार ने अमेरिका को इसके व्यापार की इजाजत नहीं दी।

इन्हें भी दिया जाता है ब्लड मील
गाय के अलावा अमेरिका व यूरोप के देशों में मुर्गियों, दुधारू पशुओं, अन्य पालतू जानवरों, मछलियों और झींगों को भी सामान्य तौर पर ब्लड मील दिया जाता है। यहां पर खाद के तौर पर खेती में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि इसके इस्तेमाल से खेतों में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है।

शोधकर्ताओं ने भी माना खतरनाक हो सकता है ब्लड मील
शोधकर्ताओं का मानना है कि ब्लड मील में एमिनो एसिड का असंतुलन होता है। इस वजह से ये दुधारू पशुओं के लिए कई बार सही चारा नहीं होता है। एमिनो एसिड का असंतुलन होने पर दुधारू पशुओं के खून में लाइसीन की मात्रा बिगड़ जाती है। खास तौर पर अधिक गर्म होने पर ब्लड मील खराब हो जाता है। ऐसे में ब्लड मील की जगह सोयाबीन भी दुधारू पशुओं के लिए लाइसीन का अच्छा स्रोत हो सकता है।

खतरनाक बीमारी का भी होता है खतरा
भारत ने ब्लड मील खाने वाली गायों के डेयरी उत्पादों पर रोक लगाने की वजह केवल आस्था और संस्कृति ही नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। बताया जाता है कि करीब चार दशक पहले (1980 आसपास) अमेरिका और ब्रिटेन में मैडकाऊ नाम की एक बीमारी ने जमकर कहर बरपाया था। चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने जब इस बीमारी की वजह जानने के लिए रिसर्च की तो पता चला कि ये बीमारी दुधारू पशुओं से इंसानों में फैल रही है। खासतौर पर उन पशुओं से जिनके चारे में जानवरों की हड्डियों के चूरे का इस्तेमाल किया जाता था। इससे पशुओं और इंसानों के नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचता है। इस वजह से अमेरिका ने 1997 से 2008 के बीच जानवरों के मांस और खून से बने चारे को लेकर कुछ नियम बनाए थे। इसके तहत जानवरों के चारे में हड्डियों के चूरे के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

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Posted By: Amit Singh