उत्‍तरकाशी, शैलेंद्र गोदियाल। पहाड़ में प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने के कारण लगातार गहराते जा रहे जल संकट ने लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। खासकर पहाड़ में जीवन की धुरी मानी जाने वाली महिलाएं इससे ज्यादा व्यथित हैं। लिहाजा इस संकट से पार पाने के लिए वह अब जंगलों में चाल-खाल तैयार कर वर्षाजल को समेटने में जुटी हुई हैं। इसकी बानगी सीमांत उत्तरकाशी जिले के तीन गांवों में देखी जा सकती है, जहां महिलाओं ने श्रमदान कर पांच चाल-खाल (तालाब) तैयार किए हैं। जिनमें हजारों लीटर वर्षाजल एकत्र हो चुका है। इन महिलाओं के इस जल संचय अभियान से अन्य गांवों के लोग भी प्रेरित हो रहे हैं और तालाबों का निर्माण कर रहे हैं। 

पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल का मुख्य आधार प्राकृतिक जलस्रोत ही हैं और ये भी वर्षा जल से ही रिचार्ज होते हैं। लेकिन, दिनोंदिन बढ़ती आबादी और सूखते जलस्रोत जल संकट का कारण बन रहे हैं। उत्तरकाशी जिले के डुंडा ब्लॉक में सरमाली जलस्रोत पर बनी पेयजल योजना से दस गांवों की प्यास बुझती है। लेकिन, इस पेयजल योजना पर भी पिछले कुछ सालों से पानी लगातार घटता जा रहा है। कुछ दिन पूर्व जल संकट से जूझ रहे इन गांवों में जब रिलायंस फाउंडेशन की टीम पहुंची तो महिलाओं ने अपनी पीड़ा उसके सामने बयां की। 

इसके बाद जल संचय के साधनों की तलाश शुरू हुई तो सरमाली जलस्रोत के कैचमेंट क्षेत्र में वर्षों पुराने ताल व चाल-खाल सूखे पड़े मिले।

ऐसे में रिलायंस फाउंडेशन के परियोजना निदेशक कमलेश गुरुरानी ने महिलाओं को चाल-खाल बनाने के लिए प्रेरित किया। जल की महत्ता समझते ही महिलाओं ने जुलाई के तीसरे सप्ताह में कुदाल-फावड़े उठाए और श्रमदान कर डांग, मसून व ओल्य गांव के आसपास पांच तालाब बना डाले। अब इन तालाबों में हजारों लीटर वर्षाजल एकत्र हो चुका है। महिलाओं के इस जुनून को देख गांव के पुरुष भी प्रेरित हुए हैं।

ग्राम पंचायत ओल्या के वन पंचायत सरपंच महावीर प्रसाद भट्ट बताते हैं कि सरमाली जलस्रोत का आधार जंगल और वर्षाजल ही है। इस स्रोत से दस गांवों के लिए जलापूर्ति होती है। महिलाओं ने यहां श्रमदान से जो चाल-खाल बनाए हैं उनसे सरमाली जलस्रोत रिचार्ज हो गया है। इसके साथ ही ग्रामीणों ने यह भी निश्चय किया है कि जो पुराने चाल-खाल हैं, उनको भी पुनर्जीवित किया जाए। इसके लिए भी ग्रामीण श्रमदान से काम करने को तैयार हो चुके हैं। ताकि भविष्य में किसी भी गांव में पीने के पानी का संकट न रहे। वहीं, इससे प्रेरणा लेकर बोन व मंदारा की महिलाओं ने भी श्रमदान से चाल-खाल तैयार किए हैं। जो बरसात के पानी से लबालब भर चुके हैं।

इन महिलाओं ने संभाली चाल-खाल बनाने की जिम्मेदारी 

  • ग्राम डांग: आशा देवी (पूर्व प्रधान), शकू देवी (अध्यक्ष आदर्श महिला ग्राम संगठन) विनिता देवी (समूह सदस्य)
  • ग्राम मसून: लखमा देवी (अध्यक्ष नागराजा स्वयं सहायता समूह), दीपा देवी (अध्यक्ष कच्चूड़ु स्वयं सहायता समूह)
  • ग्राम ओल्य: सरिता देवी (अध्यक्ष सरिता स्वयं सहायता समूह), महेश्वरी देवी (अध्यक्ष महेश्वरी स्वयं सहायता समूह)
  • ग्राम बोन-मंदारा: उषा देवी (अध्यक्ष लघु वित्त साख समूह), वसु देवी (उपाध्यक्ष लघु वित्त साख समूह)

सरमाली जलस्रोत : एक नजर 

सरमाली जलस्रोत डुंडा ब्लॉक में आता है, जिस पर दस पेयजल योजनाएं बनी हैं। डांग, ओल्य, ऊपरी बल्ला, निचला बल्ला, मसून, पटारा, पैंथर, खट्टू खाल, पुजारगांव, सरतली, रोणूवासा, डुंडा गांव, मजियासारी आदि गांवों के लिए इन पेयजल योजनाओं से जलापूर्ति होती है। 

कमलेश गुरुरानी (परियोजना निदेशक, रिलायंस फाउंडेशन) का कहना है कि वर्षाजल संचय करने के लिए चाल-खाल से बेहतर कोई और विकल्प नहीं है। पुरानी चाल-खाल में भरा मलबा, घास आदि की सफाई कर इन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसी तरह की मुहिम महिलाओं ने शुरू की है, जो धीरे-धीरे जनांदोलन का रूप ले रही है। 

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Posted By: Sunil Negi