बागेश्वर, चंद्रशेखर बड़सीला : परंपरा को निभाने के लिए उसके अतीत को समझना जरूरी है। जड़ों से जुडना जरूरी है। रस्में समय के साथ बदल रही हैं। विवाह जैसे मांगलिक अवसर को धन की बदौलत चमकदार और यादगार बनाने की जिस संस्कृति ने चरम की ओर रुख किया है, उसी के बीच बागेश्वर का भेटा गांव यह सोचने पर मजबूर करता है कि समय आधुनिक हो सकता है, पर प्राचीन परंपरा का लिबास कभी हटाना नहीं चाहिए। विवाह का आमंत्रण देने के लिए कार्ड हाईटेक छपवाए जाते हैं, स्टेटस सिंबल के तौर पर भी इस आमंत्रण पत्र को देखा जाता है, लेकिन भेटा के किसी घर में शादी हो तो वह परिवार न्यौता देने के लिए कभी कार्ड नहीं छपवाता। उस घर से दो सुहागिन महिलाएं कुमाऊंनी परिधान के साथ हाथ में थाली लेकर घर से निकलती हैं। गांव के हर घर की दहलीज पर जाती हैं। सबसे पहले हर घर की देहरी पर स्वास्तिक का चिहन बनाया जाता है और फिर उस परिवार को विवाह में पधारने का निमंत्रण दिया जाता है। वह भी मौखिक। सदियों पुरानी इस परंपरा का भेटा गांव के लोग आज भी पूरी शिद्दत के साथ निर्वाह कर रहे हैं और साथ में पेश कर रहे हैं परंपरा के संरक्षण की नजीर।

कत्यूर वंश ने लोहुमी जाति को दी थी जमीन

कुमाऊं में कत्यूर और चंद वंश के साथ गोरखाओं ने लंबे समय तक शासन किया। बागेश्वर जिले के गरुड़ को सातवीं सदी में कत्यूरी राजाओं ने अपनी राजधानी बनाया था और तब इसका नाम दिया गया कार्तिकेयपुर। यहीं डंगोली में उनकी अराध्य देवी कोटभ्रामरी का मंदिर आज भी है। कत्यूरियों ने कुमाऊं में कई मंदिर समूह बनवाए। भेटा गांव की बात करें तो इस गांव की जमीन कत्यूर वंश ने लोहुमी जाति के लोगों को गूंठ में दी थी। गूंठ का अर्थ जमीन को दान करने या चढ़ाने से है। पूर्व में गांव को भ्रामरी गूंठ कहा जाता था, लेकिन कत्यूर वंश ने जमीन गांव के लोगों को भेंट की थी तो बाद में इसका नाम भेंटा पड़ गया।

ऐसे हुई परंपरा की शुरुआत

इतिहास पर नजर डालें तो कत्यूर वंश का शासन कुमाऊं में सातवीं से 11वीं सदी तक रहा। गांव के नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान कृपाल दत्त लोहुमी बताते हैं कि सातवीं सदी से ही विवाह में निमंत्रण देने की इस अनूठी रस्म की शुरुआत हो गई थी। हमारे पूर्वजों ने इस परंपरा को निभाया और अब नई पीढ़ी में इस परंपरा के बीज हैं। उस दौर में राजा को गांव के लोग निमंत्रण देने जाते थे तो महिलाएं कत्यूरियों के महल में द्वार पर स्वास्तिक का चिह्न बनाती थीं। इसके साथ ही राजा को गांव के खेतों में होने वाली उपज का हिस्सा भी सौंपा जाता था। कत्यूर वंश के अवसान के बाद चंद वंश का उद्भव हुआ, मगर परंपरा कायम रही। गांव में लड़की या लड़के की शादी हो या फिर कोई अन्य शुभ कार्य। निमंत्रण के लिए कोई भी परिवार कार्ड नहीं छपवाता।

आज भी कोटभ्रामरी के उपासक

कोटभ्रामरी के उपासक और केवल लोहुमी जाति के लोगों के गांव भेटा की जनसंख्या 500 है। वर्तमान में यहां 238 वोटर हैं। कत्यूर वंश के बनाए नियमों के अनुसार आज भी प्रतिदिन भेटा गांव से एक परिवार का सदस्य कोटभ्रामरी मंदिर जाता है और वहां देवी पाठ करता है। ग्राम प्रधान कृपाल दत्त लोहुमी बताते हैं कि शादी के निमंत्रण के साथ भेटा में होली की परंपरा भी अनूठी है। गांव के लोग बसंत पंचमी से होली गायन शुरू करते हैं। होलाष्टक को कोटभ्रामरी मंदिरजाते हैं और मां को अबीर-गुलाल व रंग चढ़ाते हैं। तभी कत्यूर घाटी के अन्य गांवों में होली का आगाज होता है।

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Posted By: Skand Shukla

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