दीप चंद्र बेलवाल, हल्द्वानी : 'बात दिसंबर 1971 की है। हमारी प्लाटून घने जंगल में खिचड़ी बना रही थी। तभी कंपनी कमांडर आरएस खाती पहुंचे और कहा, वह लोग पाकिस्तानी फायरिंग के निशाने पर हैं। ऊंचाई वाली जगह पर पाकिस्तान टैंकों को स्थापित कर चुका था।' अदम्य साहस की वीरता भरी कहानी सुनाते हुए 80 वर्षीय शेर सिंह राणा का जोश और बढ़ जाता है। तेजी से गर्दन हिलाते हुए फिर बोले, 'मैंने सेट पर तैनात शंकर दत्त से कहा मरना तो है ही और फिर आगे बढ़ गया। कीचड़ के दलदल को पार कर पाकिस्तानी सीमा पार करने में ढाई घंटा लग गया। मेरी वर्दी कीचड़ से सन चुकी थी। एक घूंट पानी पीते ही मैंने गार्नेट से अटैक शुरू कर दिया। पहला गार्नेट सही और दूसरा गलत जगह गिरा। तीसरे गार्नेट से एक और टैंक को मैंने ध्वस्त कर दिया। एक पाकिस्तानी को हैंड्सअप कराकर अपने पास लाया।'

हल्द्वानी की पालीशीट टेड़ीपुलिया निवासी सेवानिवृत्त सूबेदार शेर सिंह राणा ने अपने इस अद्भुत पराक्रम से अपना नाम इतिहास में दर्ज कर लिया। 80 साल की उम्र में भी उन्हें भारत-पाक युद्ध 1965 व 1971 की एक-एक घटना और अधिकारी, कर्मचारी के नाम पता हैं। शेर सिंह राणा की जिंदगी संघर्षों से भरी रही। 12 वर्ष की उम्र में उनके पिता की मौत हो गई। तीन भाइयों में सबसे छोटे शेर सिंह बताते हैं कि वह घर से खाली हाथ दिल्ली के लिए निकल पड़े। एक दोस्त ने उनके बस का किराया दिया। दिल्ली में एक व्यक्ति के घर नौकरी मिल गई। 26 जनवरी को वह लाल किले में परेड देखने पहुंचे। आर्मी के जवानों को देख उन्होंने देश सेवा का संकल्प लिया। वर्ष 1961 में लाल किले पर भर्ती हुई और वह सिपाही बन गए।

सेना में भर्ती होने के बाद रानीखेत कुमाऊं रेजीमेंट से ट्रेनिंग के बाद वह पुंछ कश्मीर में चले गए। 1965 में भारत-पाक के बीच युद्ध में उन्होंने डटकर सामना किया। इस युद्ध में उनके साथ के 58 सैनिक घायल व तीन शहीद हुए। शेर सिंह बताते हैं कि वह 1965 के युद्ध में अपने अफसरों का दिल जीत चुके थे। 1971 में जब एक सिपाही से कंपनी कमांडर ने पाकिस्तानी टैंकों को गार्नेट से उड़ाने को कहा तो उसने मना कर दिया। कंपनी कमांडर आरएस खाती ने उन्हें यह काम सौंप दिया। उनके पास ब्लास्ट मशीन गन व चार गार्नेट थे। युद्ध के दौरान वह जख्मी होकर बेहोश भी हुए। तीन दिसंबर से 16 दिन तक उन्होंने अकेले सैकड़ों पाकिस्तानियों को सरेंडर कराने के साथ कई को मार गिराया।

राष्ट्रपति वीवी गिरी ने सौंपा वीर चक्र

सूबेदार शेर सिंह राणा बताते हैं कि ढाका में लालमाई पहाड़ी पर पाकिस्तानी डटे थे। भारतीय सैनिकों ने पहाड़ी के चारों और बांध बनाकर पानी से घेर लिया। जिस दिन सीजफायर होकर पाकिस्तान ने झंडे लगाकर सरेंडर कराया, उस दिन पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी की आंखों से आंसू निकल आए। सैकड़ों भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस के आगे पाकिस्तानी झुक गए। उनके साहस को देखकर उनका नाम वीर चक्र के लिए भेजा गया। मार्च 1972 में राष्ट्रपति वीवी गिरी ने वीर चक्र पदक से नवाजा।

मां को पेंसिल से लिखी चिट्ठी

शेर सिंह राणा बताते हैं कि वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। इसलिए मां जेंतुली को उनकी चिंता रहती थी। 1971 का युद्ध लडऩे से पहले उन्होंने मां को पेंसिल से लिखकर एक चिट्ठी भेजी। जिसमें कहा मैं ठीक हूं, लौटकर नहीं आया तो रोने की जरूरत मत करना। ये समझना तेरा बेटा भारत मां की रक्षा में चला गया।

सिपाही से भर्ती हुए, सूबेदार तक पहुंचे

शेर सिंह राणा वर्ष 1961 में सिपाही पद पर भर्ती हुए। 1964 में लांसनायक, 1965 में स्पेशल प्रमोशन पेड लांस नायक, 1967 में नायक, 1967 में ही लांस हवलदार, 1972 में हवलदार, 16 वर्ष की सेवा पर नायब सूबेदार और फिर सूबेदार से सेवानिवृत्त हुए। शेर सिंह राणा ने बताया कि वह जब सेना में भर्ती हुए, तब 39 रुपये मानदेय मिलता था।

वीर चक्र विजेता का प्रोफाइल

नाम- शेर सिंह राणा

पिता का नाम- लाल सिंह राणा

सेवानिवृत्ति के दौरान पद- सूबेदार

जन्म- 26 सितंबर 1942

जन्म स्थल- पट्टी, तल्ली रिठागाड, थिकालना अल्मोड़ा

हाल पता- पालीशीट टेड़ी पुलिया हल्द्वानी।

Edited By: Skand Shukla