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    जनरल डायर को मारने के लिए किताब में पिस्‍टल लेकर गए थे शहीद ऊधम सिंह

    By Skand ShuklaEdited By:
    Updated: Sun, 26 Dec 2021 05:40 PM (IST)

    पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के सुनाम गांव में एक सिख-कम्बोज परिवार में 26 दिसंबर 1899 को पैदा हुए शहीद ऊधम सिंह कंबोज के सिर से महज तीन वर्ष की उम्र व ...और पढ़ें

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    जनरल डायर को मारने के लिए किताब में पिस्‍टल लेकर गए थे शहीद ऊधम सिंह

    जीवन सिंह सैनी, बाजपुर : जालियांवाला बाग नरसंहार के सूत्रधार माइकल जनरल ओ डायर को मौत के घाट उतारने वाले शहीद ऊधम सिंह कंबोज के सिर से बचपन में माता पिता का साया का सिर से उठ गया था। पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के सुनाम गांव में एक सिख-कम्बोज परिवार में 26 दिसंबर, 1899 को पैदा हुए इस वीर के सिर से महज तीन वर्ष की उम्र वर्ष 1901 में मां और 1907 में पिता साया उठ गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उनके ही नाम पर उत्‍तराखंड के सिख बहुल जिले का नाम ऊधमसिंहनगर नगर रखा गया है।

    ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले। वर्ष, 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा जनरल ओ डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।

    21 वर्ष बाद पूरी हुई प्रतिज्ञा

    13 अप्रैल, 1919 को जालियांवाला बाग में नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी रहे ऊधम सिंह कंबोज ने उसी दिन संकल्प लिया था कि वह इसका बदला जरूर लेंगे। भले ही राजनीतिक कारणों से जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या आज तक सामने नहीं आ पाई। इस घटना वीर ऊधम सिंह को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ली। उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की।

    किताब में ले गए थे पिस्‍टल

    वर्ष 1934 में वह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। 21 वर्ष बाद 13 मार्च, 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी, जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधम सिंह उस दिन समय से बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवाल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए डायर पर गोलियां दाग दीं। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को ऊधम सिंसह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई,1940 को पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।