हल्द्वानी, जेएनएन : कुमाऊं में रोजगार का सबसे बड़ा साधन कही जाने वाली गौला अब संकट के दौर से गुजर रही है। बारिश कम होने की वजह से हर साल उपखनिज कम मात्रा में पहुंच रहा है। सालों पूर्व हुए भूगर्भीय सर्वे के दौरान नदी की स्थिति ठीक थी। वन विभाग के मुताबिक एक साल बाद नया सर्वे होना है। सूत्रों की मानें तो खनन को लेकर अहम मानी जाने वाली भूगर्भीय सर्वे की रिपोर्ट से गौला से खनन पर संकट खड़ा हो सकता है। रोजगार और नदी दोनों को बचाने के लिए नए सिरे से काम करना होगा।

गौला तराई पूर्वी वन प्रभाग के अंतर्गत आती है। शीशमहल से लेकर शांतिपुरी तक खनन होता है। करीब 29 किमी लंबे क्षेत्र में साढ़े दस हजार हेक्टेयर क्षेत्र से खनन किया जाता है। इसमें नदी के दोनों तरफ 25-25 प्रतिशत क्षेत्र को छोड़कर बीच के 50 प्रतिशत भाग से ही उपखनिज निकाला जा सकता है। पिछले तीन सालों से बारिश कम होने की वजह से उपखनिज की मात्रा व उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। स्थिति इस हद तक पहुंच गई कि इस बार मार्च में ही नदी में स्थित कई गेटों पर रेत की जगह काली मिट्टी निकलनी शुरू हो गई। वन विभाग की मानें तो अगला सत्र खत्म होने के बाद गौला का नए सिरे से भूगर्भीय सर्वे होगा। अब इस बात से इन्कार नहीं किया जा रहा कि गौला की स्थिति को देखते हुए भविष्य में होने वाला सर्वे व उसकी रिपोर्ट कुमाऊं के सबसे बड़े रोजगार साधन पर संकट खड़ा कर सकती है।

नंधौर व नई नदियों में रिपोर्ट से तय होता है लक्ष्य

आरक्षित वन क्षेत्र में भूगर्भीय सर्वे की रिपोर्ट खनन कार्य को लेकर अहम मानी जाती है। नंधौर और अन्य नदियों में जहां से निकासी होती है, हर साल सर्वे किया जाता है। उसके आधार पर लक्ष्य तय किया जाता है। इस वजह से यहां लक्ष्य कम-ज्यादा होता रहता है।

गौला में 54 लाख घनमीटर अधिकतम निकासी

गौला के 11 निकासी गेटों से अधिकतम 54 लाख घनमीटर उपखनिज की निकासी हो सकती है। पूर्व में हुए सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर यह लक्ष्य तय किया गया था। हालांकि हर साल केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण की टीम का निरीक्षण उस सत्र की मात्रा तय करता है। पिछले साल 42 लाख घनमीटर उपखनिज निकला था। इस बार और कम लक्ष्य तय होगा।

भूगर्भीय सर्वे रिपोर्ट के मायने

इस सर्वे से पता चलता है कि नदी का डायवर्जन किस ओर हो रहा है। जलस्तर की मात्रा कितनी है। पानी से होने वाला कटाव व खनन से कितना असर पड़ रहा है। इन सभी तथ्यों को वैज्ञानिक सर्वे के बाद रिपोर्ट में शामिल करते हैं।

पहली बारिश मिट्टी, दूसरी रेत व तीसरी बोल्डर लाती थी

वन विभाग की मानें तो गौला में खनन का आधार पहाड़ में होने वाली बारिश है। एक समय माना जाता था कि शुरुआती बारिश में नदी में मिट्टी, उसके बाद रेत-बजरी व मूसलधार होने की स्थिति में बड़े बोल्डर तक पहुंचते थे, लेकिन लगातार कम हो रही बारिश ने इस चक्र को बदल दिया है।

साढ़े तीन किमी एरिया प्रतिबंधित

शीशमहल से शांतिपुरी तक साढ़े तीन किमी एरिया खनन के लिए प्रतिबंधित है। इसमें गौला पुल के पास ऊपर-नीचे 500-500 मीटर व बिंदुखत्ता में ढाई किमी क्षेत्र में हाथी कॉरिडोर का हिस्सा होने की वजह से चुगान नहीं हो सकता।

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Posted By: Skand Shukla

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