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    स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामदत्त जोशी का 105 वर्ष की उम्र में निधन nainital news

    By Skand ShuklaEdited By:
    Updated: Wed, 22 Jan 2020 09:13 AM (IST)

    स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामदत्त जोशी का 105 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन पर बागेश्वर के बनलेख क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।

    स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामदत्त जोशी का 105 वर्ष की उम्र में निधन nainital news

    हल्द्वानी/बागेश्वर, जेएनएन : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामदत्त जोशी का 105 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन पर बागेश्वर के बनलेख क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। सोमवार को उन्हें सरयू-गोमती संगम पर नम आंखों ने अंतिम विदाई दी और प्रशासन ने पुष्प चक्र अर्पित किए।

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    आजादी के लिए अंग्रेजों से लिया था लोहा

    बागेश्वर जिले के बनलेख के अकसौड़ा गांव निवासी रामदत्त जोशी ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया था और अब क्षेत्र के विकास के लिए आंदोलित थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल भी गए और क्षेत्र की समस्याओं को लेकर कई बार अनशन पर भी बैठे। मंगलवार को उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

    घाट पर ये रहे मौजूद

    इस मौके पर विधायक चंदन राम दास, एसडीएम राकेश चंद्र तिवारी, सीओ संगीता, तहसीलदार नवाजिस खलीक, देवेंद्र परिहार, सच्जन लाल टम्टा, नपाअ सुरेश खेतवाल, राजेंद्र टंगड़यिा, लोकमणि पाठक, दलीप  ङ्क्षसह खेतवाल, धीरज कोरंगा समेत तमाम लोग मौजूद थे। उधर, विधायक बलवंत भौर्याल, पूर्व विधायक ललित फस्र्वाण, पूर्व जिपं अध्यक्ष हरीश ऐठानी, पुष्पा मिश्रा, कमला गुरुरानी, हरीश सोनी, नवीन लाल साह, इंद्र ङ्क्षसह फस्र्वाण, नवीन परिहार आदि ने गहरा दुख जताया है। वहीं उनके बेटे पीसी जोशी बेस अस्पताल हल्द्वानी में फार्मासिस्ट पद पर कार्यरत हैं।

    याद रहेगा रामदत्त जोशी का बलिदान

    स्वतंत्रता आंदोलन में रामदत्त जोशी का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। स्वतंत्रता की ज्वाला जलाने व आगे बढ़ाने पर अंग्रेजों ने 1942 में रामदत्त जोशी को एक साल के कठोर कारावास का दंड सुनाया था। उन्हें पहले हल्द्वानी कारागार और फिर बरेली जिला कारागार में रखा गया। 1943 में जेल से रिहा करने के बाद उन्हें धारा 129 डीआइआर के तहत फिर से नजरबंद कर दिया गया था। रामदत्त जोशी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित लाल बहादुर शास्त्री व पंडित गोविंद बल्लभ पंत के काफी करीबी रहे थे। उन्होंने अपना सारा जीवन सादगी व गांधीवादी विचारधारा में व्यतीत किया। आजादी के बाद भी वह जनसमस्याओं के समाधान के लिए संघर्षरत रहे। दोफाड़-धरमघर मोटरमार्ग, डिग्री कालेज बनलेख, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनलेख, राजकीय इंटर कालेज बनलेख, तहसील दुगनाकुरी बनाने कई विकास परक कामों के लिए उन्होंने महत्वूपर्ण योगदान दिया।

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