हल्द्वानी, जेएनएन : पहाड़ में लीसे के जरिये कारोबार करने वाले 20 हजार लोग परेशान हैं। दो माह से टेंडर अटकने के कारण उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इनमें ठेकेदार व मजदूर से लेकर वाहन स्वामी तक शामिल हैं। जंगल में चीड़ के पेड़ों से लेकर लीसा निकालने के बाद डिपो तक पहुंचाने का जिम्मा टेंडर में था।

वन विभाग के पास राजस्व कमाने के तीन साधन हैं। इमारती लकड़ी, मैदानी क्षेत्र में खनन व पहाड़ में लीसा। हजारों की संख्या में लोग इस कार्य से जुड़े हैं। सोमवार को एफटीआइ पहुंचे लीसा कारोबारियों ने चीफ कुमाऊं डॉ. विवेक पांडे व डीएफओ नैनीताल वन प्रभाग टीआर बीजूलाल को अपनी पीड़ा बताई। कहा कि आठ मार्च को गुड़ान व ढुलान को लेकर फॉरेस्ट ने विज्ञप्ति निकाली थी। 15 से 29 मार्च तक टेंडर भरे गए। टेंडर 30 को खुलना था, लेकिन विभागीय लापरवाही की वजह से टेंडर नहीं खुले। जिस वजह से ठेकेदार परेशान हैं। बाहर से बुलाए गए मजदूर भी जाने की बात कर रहे हैं। एक माह से लगातार उन्हें आश्वासन दिया जा रहा है। वहीं विभागीय अधिकारियों ने एक सप्ताह के भीतर समस्या के समाधान का आश्वासन दिया है। इस दौरान दान सिंह देवलिया, मदन मोहन भट्ट, राजेंद्र बिष्ट, गणेश सिंह ठठोला, विजय सनवाल, तारा दत्त रूबाली, मोहन राम, दिनेश परगाई, जगदीश, त्रिलोक सिंह मौजूद रहे। 

अप्रैल से दिसंबर तक समय 
चीड़ के पेड़ से लीसा निकालने का समय अप्रैल से दिसंबर तक होता है। ज्यादा सर्दियां पड़ते ही लीसा जमने लगता है। कूपी के सहारे टिन में लीसा भरा जाता है। सुल्ताननगरी, हनुमानगढ़ी में बड़े लीसा गोदाम में माल रखा जाता है।

जून से फरवरी तक कमाए 96 करोड़ 
चीड़ के पेड़ से निकलने वाला लीसा जहां पहाड़ के हजारों लोगों को रोजगार मुहैया करवाता है, वहीं वन विभाग का खजाना भी भरता है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल जून से लेकर इस साल फरवरी तक विभाग को एक लाख 85 हजार क्विंटल लीसा बेचने पर 96 करोड़ से अधिक आय प्राप्त हुई। 

समाधान का चल रहा है प्रयास 
टीआर बीजूलाल, डीएफओ नैनीताल वन प्रभाग ने बताया कि वर्किंग प्लान के चलते देरी हुई है। बाद में आचार संहिता भी लग गई। मामले को प्रमुख वन संरक्षक के समक्ष भी रखा गया है। जल्द इस समस्या का समाधान हो जाए, इसके लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है। 

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Posted By: Skand Shukla

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