जागरण संवाददाता, हरिद्वार :  कुंभ की नई तिथियों पर अखाड़ों का रूख जानने को 24 या 25 फरवरी को हरिद्वार में होने वाली अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की बैठक के हंगामेदार होने के आसार हैं। कुंभ अवधि कम करने पर सरकार का साथ देने संबंधी अखाड़ा परिषद के महामंत्री के पत्र और अखाड़ा परिषद में बैरागी अणियों की उपेक्षा का मुद्दा गर्माने की पूरी आशंका है।

हरिद्वार कुंभ को लेकर संन्यासी और बैरागी अखाड़ों में इस बात को लेकर रार शुरू हो गयी थी कि अखाड़ा परिषद में दोनों का बराबर प्रतिनिधित्व होना चाहिए। तमाम मौके पर विरोध के स्वर भी मुखर हुए पर, मामला जोर न पकड़ सका। पहली बार इसने उस वक्त जोर पकड़ा जब राज्य सरकार ने कुंभ की तैयारियों के लिए अखाड़ों को एक-एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की। इसमें बैरागी अणियां और उनके अखाड़े शामिल नहीं थे, क्योंकि उनके पास हरिद्वार में न तो अपना कोई स्थायी भवन है और न कोई भूमि। इसके बाद से ही परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरि उनके निशाने पर आ गए थे। भूमि आवंटन और बैरागी कैंप क्षेत्र से अतिक्रमण न हटाए जाने संबंधी तथा अन्य मामलों में भी यह मसला बैरागी अणियों के विरोध का हिस्सा रहा। तीनों बैरागी अणियों का यह गुस्सा 13 फरवरी को उस वक्त फूट पड़ा, जब उन्होंने पत्रकारवार्ता कर अखाड़ा परिषद को भंग करने का एलान करते हुए खुद को उससे अलग कर लिया और नए चुनाव की मांग कर डाली। इसके बाद हरिद्वार में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की यह पहली बैठक होगी, लिहाजा इन मुद्दों पर अब तक परिषद से बाहर हो रही बयानबाजी परिषद की बैठक में होगी। दिगंबर अणि के प्रतिनिधि बाबा बलरामदास योग, बाबा हठयोगी का कहना है कि उनकी मांग के बाद अखाड़ा परिषद की यह पहली बैठक होगी, इसमें यह मामला तो जरूर से उठेगा।

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मथुरा-वृंदावन यमुना कुंभ के शाही स्नान में संन्यासी अखाड़ों पर पाबंदी

हरिद्वार : बैरागी अणियों की परंपरा के अनुसार हरिद्वार कुंभ से पहले एक माह संत समागम यमुना कुंभ मथुरा-वृंदावन में आयोजित होता है। यहां से सभी बैरागी अणियां, उनके 18 अखाड़े और 950 से अधिक खालसे सीधे हरिद्वार पहुंचते हैं। इस दौरान वह मथुरा-वृंदावन में तीन शाही स्नान करते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार इन तीनों ही शाही स्नान में संन्यासी अखाड़ों के सम्मिलित होने पर पाबंदी लगा दी है। इसे लेकर अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरि अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने इस मामले में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष शीमहंत नरेंद्र गिरि से हस्तक्षेप की मांग भी की थी। लेकिन, श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने मामले को तूल देने की बजाए शांत रहना ही उचित समझा। श्रीमहंत हरिगिरि का कहना है कि ऐसा गलत किया गया है, अगर उन्हें (संन्यासी अखाड़ों) को अनुमति मिली होती तो वह यहां पर कई स्थायी निर्माण कराते। लेकिन, मनमानी से सब धरा रह गया।

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