देहरादून, केदार दत्त। देशभर में लॉकडाउन है। लोग घरों में हैं। सभी दुआ कर रहे कि कोरोना रूपी संकट जल्द यहां की फिजां से दूर हो। इस परिदृश्य के बीच दिलचस्प पहलू ये भी है कि जहां शहरों, कस्बों और गांवों में सन्नाटा है, वहीं जंगल की देहरी पार कर बेजुबान इस सन्नाटे को चीर रहे हैं। उत्तराखंड का सूरतेहाल भी इससे जुदा नहीं है। फिर चाहे वह धर्मनगरी हरिद्वार हो अथवा दूसरे शहर और कस्बे। जगह-जगह वन्यजीव सड़कों पर नजर आ रहे। राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे हरिद्वार में तो हरकी पैड़ी क्षेत्र में भी पहली बार गजराज आ धमके। न सिर्फ राजाजी बल्कि कार्बेट टाइगर रिजर्व के अलावा अन्य संरक्षित और आरक्षित क्षेत्रों से लगे सड़क व रेल मार्गों पर भी वन्यजीव इन दिनों स्वछंद विचरण करते दिख रहे। शुक्र इस बात का है कि वन्यजीवों ने कहीं किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई, मगर सांसें तो अटकाई ही हुई हैं।

तस्करों व शिकारियों ने उड़ाई नींद

यह किसी से छिपा नहीं है कि वन्यजीव विविधता वाले उत्तराखंड में फल-फूल रहे जंगली जानवरों के कुनबे पर शिकारी गिद्धदृष्टि गड़ाए हैं। तस्करों व शिकारियों की समय-समय पर होने वाली धरपकड़ के दौरान यह बात कई बार सामने आ चुकी है। हालांकि, इस सबके मद्देनजर वन्यजीव सुरक्षा के लिए कदम उठाए गए हैं, लेकिन वर्तमान में स्थिति एकदम से अलग है। लॉकडाउन के चलते आवाजाही कम होने से चुनौती बढ़ गई है। चिंता ये सता रही कि इस अवधि में शिकारियों व तस्करों ने जंगलों में घुसपैठ कर दी तो क्या होगा। फिर इन दिनों तो बेजुबान वैसे भी जंगल से निकलकर स्वछंद विचरण कर रहे हैं। सूरतेहाल, उन पर खतरा बढ़ गया है। राजाजी टाइगर रिजर्व में हाल में अवांछनीय तत्वों की मौजूदगी इसकी तस्दीक करती है। लिहाजा, चौकसी बढ़ाने की जरूरत है। यद्यपि, महकमे ने कदम उठाए हैं, मगर इसमें सभी को सहयोग करना होगा।

जंगल में  पानी की उपलब्धता चुनौती

उत्तराखंड में भी तापमान धीरे-धीरे उछाल भरने लगा है। इसके साथ ही जंगलों और उनसे लगे इलाकों में वन्यजीवों के लिए पानी की उपलब्धता किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। फिलहाल, यह समस्या मैदानी क्षेत्रों में अधिक चुनौतीपूर्ण है। खासकर, कार्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व के साथ ही इनसे लगे संरक्षित व आरक्षित वन क्षेत्रों में। हालांकि, वन्यजीवों के लिए पानी की उपलब्धता के दृष्टिगत वहां कई स्थायी वाटरहोल (पक्के जोहड़) और कुछ कच्चे वाटरहोल बनाकर उनमें पानी डाला जाता है। लेकिन, मौजूदा परिस्थितियों में इन वाटरहोल को पानी से लबालब करने की चुनौती है। साथ ही ऐसे स्थल भी चिह्नित किए जाने होंगे, जहां इन दिनों वन्यजीवों की आवाजाही बनी हुई है। उनके लिए पानी का इंतजाम होने पर वे हलक तर करने को इधर-उधर आबादी की तरफ नहीं भटकेंगे। साथ ही इससे जंगली जानवरों के मनुष्य से टकराव की संभावना पर भी काफी हद तक अंकुश लगेगा।

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कहीं व्यवहार में बदलाव तो नहीं

मौजूदा दौर में जंगली जानवर जिस तरह से सड़कों, शहरों, कस्बों व गांवों के इर्द-गिर्द धमक रहे, उससे ये बात भी उठने लगी कि कहीं इनके व्यवहार में बदलाव तो नहीं आ रहा। ऐसा नहीं कि वन्यजीव पहली बार आबादी के नजदीक आ रहे हों। उत्तराखंड में तो ऐसा निरंतर हो रहा और इसी के चलते मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ा है। अलबत्ता, बदली परिस्थितियों में जब लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे और सड़कों पर वाहनों की चिल्लपौं नहीं है। ऐसे में यह देखा जाना चाहिए कि वन्यजीवों के व्यवहार में क्या बदलाव दिख रहे हैं। मसलन, कहीं हिंसक जानवरों के आक्रामक रुख में कमी देखी गई होगी तो कहीं मनुष्य द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले आसान भोजन की आस में रहने वाले बंदर समेत दूसरे वन्यजीव जंगलों में भोजन के नए स्रोत तलाश रहे होंगे। वन्यजीवों के व्यवहार से जुड़े ऐसे बिंदुओं का अध्ययन कराने की जरूरत है।

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Posted By: Sunil Negi

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