देहरादून, दिनेश कुकरेती। उत्तराखंड की संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतने ही मन को मोहने वाले यहां के लोकगीत-नृत्य भी हैं। यहां लोक की विरासत समुद्र की भांति है, जो अपने आप में विभिन्न रंग और रत्न समेटे हुए है। हालांकि, वक्त की चकाचौंध में अधिकांश लोकनृत्य कालातीत हो गए, बावजूद इसके उपलब्ध नृत्यों का अद्भुत सम्मोहन है। हम आपको उत्तराखंडी लोक के इसी मनोहारी रूप से के बारे में बताएंगे। 

उत्तराखंडी लोकजीवन अलग ही सुर-ताल लिए हुए है, जिसकी छाप यहां के लोकगीत-नृत्यों में भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। उत्तराखंडी लोकगीत-नृत्य महज मनोरंजन का ही जरिया नहीं हैं, बल्कि वह लोकजीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों से सीख लेने की प्रेरणा भी देते हैं। हालांकि, समय के साथ बहुत से लोकगीत-नृत्य विलुप्त हो गए, लेकिन बचे हुए लोकगीत-नृत्यों की भी अपनी विशिष्ट पहचान है। उत्तराखंड में लगभग दर्जनभर लोक विधाएं आज भी अस्तित्व में हैं, जिनमें चैती गीत यानी चौंफला, चांचड़ी और झुमैलो जैसे समूह में किए जाने वाले गीत-नृत्य आते हैं। इन तीनों ही गीतों में महिला-पुरुष की टोली एक ही घेरे में नृत्य करती है। हालांकि, तीनों की नृत्य शैली भिन्न है, लेकिन तीनों में ही श्रृंगार एवं भाव की प्रधानता होती है।

चौंफला: चांचड़ी और झुमैलो आदिकाल से ही शरदकालीन त्योहारों का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अब वासंती उल्लास का गीत चौंफला भी इनमें शामिल हो गया है। चौंफला का शाब्दिक अर्थ है, चारों ओर खिले हुए फूल। जिस नृत्य में फूल के घेरे की भांति वृत्त बनाकर नृत्य किया जाता है, उसे चौंफला कहते हैं। मान्यता है कि देवी पार्वती सखियों के साथ हिमालय के पुष्पाच्छादित मैदानों में नृत्य किया करती थीं। इसी से चौंफला की उत्पत्ति हुई। इस नृत्य में स्त्री-पुरुष वृत्ताकार में कदम मिला, एक-दूसरे के विपरीत खड़े होकर नृत्य करते है। जबकि, दर्शक तालियों से संगीत में संगत करते हैं।

थड़िया: 'थाड़' शब्द का अर्थ होता है आंगन यानी घर के आंगन में आयोजित होने वाले संगीत और नृत्य के उत्सव को थडिय़ा कहते हैं। इसका आयोजन वसंत पंचमी के दौरान किया जाता है। इस समय रातें लंबी होती हैं, लिहाजा मनोरंजन के लिए गांव के लोग मिलकर थड का आयोजन करते हैं। जिन बेटियों का विवाह हो चुका है, उन्हें भी गांव में आमंत्रित किया जाता है। सुंदर गीतों और तालों के साथ सभी लोग कदम से कदम मिलाकर नृत्य का आनंद लेते है। इन गीतों की विशिष्ट गायन एवं नृत्य शैली को भी थडिय़ा कहा जाता है। 

तांदी: उत्तरकाशी और टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र में तांदी नृत्य खुशी के मौकों और माघ के पूरे महीने में पेश किया जाता है। इसमें सभी लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर श्रृंखलाबद्ध हो नृत्य करते है। इस नृत्य के साथ गाए जाने वाले गीत सामाजिक घटनाओं पर आधारित होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से रचा जाता है। विशेषकर इनमें तात्कालिक घटनाओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों के कार्यों का उल्लेख होता है।

झुमैलो: झुमैलो सामूहिक नृत्य है, जो बिना वाद्ययंत्रों के दीपावली और कार्तिक के महीने में पूरी रात किया जाता है। गीत की पंक्तियों के अंत में झुमैलो की आवृत्ति और नृत्य में झूमने की भावना या गति का समावेश होने के कारण इसे झुमैलो कहा गया है। एक तरह से यह नारी हृदय की वेदना और उसकेप्रेम की अभिव्यक्ति है। इसमें नारी अपनी पीड़ा को भूल सकारात्मक सोच के साथ गीत एवं संगीत की सुर लहरियों पर नृत्य करती है।

छोलिया: छोलिया उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल का प्रसिद्ध लोकनृत्य है। इसमें पौराणिक युद्ध और सैनिकों का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। असल में छोलिया नृत्य युद्ध में विजय के पश्चात होने वाले उत्सव का दृश्य प्रस्तुत करता है। सभी नर्तक पौराणिक सैनिकों का वेशभूषा धारण कर तलवार और ढाल के साथ युद्ध का अभिनय करते है। विभिन्न लोक वाद्यों ढोल-दमाऊ, रणसिंगा, तुरही और मशकबीन के सुरमयी तालमेल से यह नृत्य जन-जन में उत्साह का संचार कर देता है।

सरौं व पौंणा: गढ़वाल में सरौं, छोलिया और पौंणा नृत्य प्रसिद्ध हैं। तीनों की शैलियां अलग-अलग हैं, लेकिन वीर रस एवं शौर्य प्रधान सामाग्री का प्रयोग तीनों में ही किया जाता है। सरौं नृत्य में ढोल वादक मुख्य किरदार होते हैं, जबकि छोलिया और पौंणा नृत्य को वादक एवं नर्तक के साझा करतब पूर्णता प्रदान करते हैं। इन नृत्यों में सतरंगी पोशाक, ढोल-दमाऊ, नगाड़ा, भंकोरा, कैंसाल, रणसिंगा और ढाल-तलवार अनिवार्य हैं।

झोड़ा: इसे हिंदी के 'जोड़ा' शब्द से लिया गया है। यह शादी-ब्याह और कौथिग (मेला) में हाथों को जोड़कर या जोड़े बनाकर किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। जिसके मुख्य रूप से दो रूप प्रचलन में हैं, एक मुक्तक झोड़ा और दूसरा प्रबंधात्मक झोड़ा। प्रबंधात्मक झोड़ा में देवी-देवताओं और एतिहासिक वीर भड़ों का चरित्र गान होता है। इसमें स्त्री-पुरुष गोल घेरा बनाकर एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रख पग आगे-पीछे करते हुए नृत्य करते हैं। घेरे के बीच में मुख्य गायक हुड़का वादन करते हुए गीत की पहली पंक्ति गाता है, जबकि अन्य लोग उसे लय में दोहराते हैं। कुमाऊं के बागेश्वर क्षेत्र में माघ की चांदनी रात में किया जाने वाला यह नृत्य स्त्री-पुरुष का शृंगारिक नृत्य माना गया है।

चांचरी (चांचड़ी): यह संस्कृत से लिया गया शब्द है, जिसका अर्थ है नृत्य ताल समर्पित गीत। मूलत: यह कुमाऊं के दानपुर क्षेत्र की नृत्य शैली है, जिसे झोड़े का प्राचीन रूप माना गया है। इसमें भी स्त्री-पुरुष दोनों सम्मलित होते हैं। इसका मुख्य आकर्षण रंगीन वेशभूषा व विविधता है। इस नृत्य में धार्मिक भावना की प्रधानता रहती है।

हुड़का नृत्य: ढोल नृत्य की तरह प्राचीन इस नृत्य को भी कई नामों से जाना जाता है। मध्य युग में हुड़किये चारण कवि युद्ध भूमि में अपने स्वामी की प्रशंसा में इस नृत्य को किया करते थे। कुमाऊं में इस नृत्य को खास पसंद किया जाता है

छपेली: कुमाऊं के इस नृत्य को 'छबीली' भी कहा जाता है। इसे प्रेमी युगल का नृत्य माना गया है। यह विशुद्ध लोकनृत्य न होकर नृत्य गीत है। जिस गीत में स्त्रियों का प्रसंग वर्णित हो, वहां इसे छपेली कहा जाता है। प्रेम एवं शृंगार प्रधान इस नृत्य में कभी-कभी पुरुष ही स्त्री वेशभूषा में अभिनय करता है। पुरुष के हाथ में हुड़की होती है, जिसे बजाते हुए वह नृत्य करता है और गीत गाता है। बदले में महिला शर्माने की भाव-भंगिमा बनाकर अपनी अभिव्यक्ति देती है।

जागर और पंवाड़ा: जागर और पंवाड़ा लोकनृत्य देवी-देवताओं को नचवाने के लिए किए जाते हैं। देवी-देवताओं की कथाओं पर आधारित गायन और छंदबद्ध कथावाचन (गाथा) का प्रस्तुतीकरण इस विधा का रोचक पक्ष है। गायन-वादन के लिए विशेष रूप से गुरु-शिष्य परंपरा में प्रशिक्षित व्यक्ति ही आमंत्रित किए जाते हैं, जिनका आज भी यही मुख्य रोजगार है।

पंडावर्त: पांडवों से जुड़ी घटनाओं पर आधारित पंडावर्त शैली के लोकनृत्य वास्तव में नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। ये लोकनृत्य 20 लोक नाट्यों में 32 तालों और सौ अलग-अलग स्वरलिपि में आबद्ध होते हैं। पांडव नृत्य पांच से लेकर नौ दिन तक का हो सकता है, जिसमें कई पात्र होते हैं।

मंडाण: उत्तराखंड के प्राचीन लोकनृत्यों में मंडाण सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। शादी-ब्याह अथवा धार्मिक अनुष्ठानों के मौके पर गांव के खुले मैदान (खलिहान) या चौक के बीच में अग्नि प्रज्ज्वलित कर मंडाण नृत्य होता है। इस दौरान ढोल-दमौ, रणसिंगा, भंकोर आदि पारंपरिक वाद्यों की धुनों पर देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। इसमें ज्यादातर गीत महाभारत कालीन प्रसंगों पर आधारित होते हैं। इसके अलावा लोक गाथाओं पर आधारित गीत भी गाए जाते है। देखा जाए तो यह पंडौं नृत्य का ही एक रूप है।

हंत्या (अशांत आत्मा नृत्य): दिवंगत आत्मा की शांति के लिए अत्यंत कारुणिक गीत रांसो का गायन होता है और डमरू व थाली (डौंर-थाली) के सुरों पर नृत्य किया जाता है। ऐसे छह नृत्य हैं, चर्याभूत नृत्य, हंत्या भूत नृत्य, व्यराल नृत्य, सैद नृत्य, घात नृत्य और दल्या भूत नृत्य।

रणभूत नृत्य: गढ़वाल क्षेत्र में किया जाने वाला यह नृत्य युद्ध में मारे गए वीर भड़ों को देवता के समान आदर देने के लिए किया जाता है, ताकि वीर की आत्मा को शांति मिले। इसे 'देवता घिरना' भी कहते हैं और यह दिवंगत वीर के वंशजों द्वारा करवाया जाता है। गढ़वाल व कुमाऊं का पंवाड़ा या भाड़ौं नृत्य भी इसी श्रेणी का नृत्य है।

भागनौली नृत्य: यह कुमाऊं अंचल का नृत्य है, जिसे मेलों में किया जाता है। इस नृत्य में हुड़का और नागदा जैसे वाद्ययंत्र प्रमुख होते हैं।

लांग (लांगविर) नृत्य: यह गढ़वाल का उत्साहवद्र्धन करने वाला नृत्य है, जिसमें पुरुष को एक सीधे खंभे के शीर्ष पर पेट के सहारे संतुलन बनाकर नाचना होता है। नीचे लोक वादक ढोल-दमाऊ की सुरलहरियों से नृत्य को और भी दिलचस्प बना देते हैं। यह नृत्य टिहरी जिले में काफी प्रसिद्ध है।

हारुल: महाभारत की गाथा पर आधारित यह जौनसार का प्रमुख लोकनृत्य है। जौनसार क्षेत्र में पांडवों का अज्ञातवास होने के कारण यहां उनके कई नृत्य प्रसिद्ध हैं। इस नृत्य में रामतुला (वाद्ययंत्र) बजाना अनिवार्य होता है।

बुड़ियात: जौनसार बाबर में यह नृत्य शादी-ब्याह, जन्मोत्सव जैसे खुशी के मौकों पर किया जाता है।

नाटी: यह देहरादून जिले की चकराता तहसील का पारंपरिक नृत्य है। जौनसार क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश से जुड़े होने के कारण यहां की नृत्य शैली भी हिमाचल से काफी मिलती-जुलती है। महिला-पुरुष रंगीन कपड़े पहनकर इस नृत्य को करते हैं।

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Posted By: Raksha Panthari

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