जागरण संवाददाता, नई टिहरी: प्रसिद्ध सेम मुखेम नागराजा मंदिर में हर वर्ष नवंबर माह में मेला आयोजित किया जाता है। सेम मुखेम में भगवान श्रीकृष्ण को शेषनाग के अवतार के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण सेम मुखेम में यात्रा के लिए आए थे तो उन्हें यह स्थान बेहद प्रिय लगा। उस वक्त सेम मुखेम के राजा गंगू रमोला से उन्होंने जगह मांगी तो गंगू रमोला ने जगह देने से इंकार कर दिया। जिससे क्रोधित होकर भगवान कृष्ण ने गंगू रमोला की सभी गाय भैंस को पत्थर बना दिया। उसके बाद गंगू रमोला के जगह देने के बाद भगवान श्रीकृष्ण के रुप में यहीं पर स्थापित हो गए।

टिहरी जिले के प्रतापनगर ब्लॉक में सेम मुखेम नागराजा मंदिर टिहरी उत्तरकाशी और पौड़ी जिलों के भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। हर वर्ष नवंबर में यहां पर तीन दिवसीय मेला आयोजित किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण यात्रा पर निकले तो सेम मुखेम उन्हें बेहद सुंदर लगा। उन्होंने वहां के राजा गंगू रमोला से कुछ जगह मांगी तो गंगू रमोला ने श्रीकृष्ण को जगह नहीं दी। जिससे नाराज होकर श्रीकृष्ण ने वहां उसकी गाय और भैंस को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया।

लेकिन उसके बाद गंगू रमोला की पत्नी ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की और उन्हें वहां पर रहने की जगह दी। जिसके बाद श्रीकृष्ण भगवान शेषनाग के रूप में वहीं पर स्थापित हो गए। उसके बाद से ही नागराजा की पूजा के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु मंदिर में आते हैं। जिला पंचायत सदस्य रेखा असवाल ने बताया कि मंदिर में दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी यहां पर मेला शुरू होने से पहले ही श्रद्धालु पहुंचने शुरू हो गए थे।

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रात भर जागते हैं उत्तरकाशी के श्रद्धालु

सेम मुखेम मंदिर में उत्तरकाशी और पौड़ी जिले के श्रद्धालु हर वर्ष आते हैं। यहां पर उत्तरकाशी के रंवाई घाटी के हजारों ग्रामीण नागराजा के दर्शन करने के लिए आते हैं और रातभर मंदिर में जागरण करते हैं। यहां पर रवांई घाटी के श्रद्धालु रात भर सोते नहीं हैं और पूजा करते है। पूरे वर्ष भर यहां पर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं।

आज भी पहाड़ी पर बनी हैं शिलाएं

सेम मुखेम मंदिर के आसपास पहाड़ी पर आज भी सैंकड़ों पत्थर की शिलाएं हैं। जो दूर से किसी जानवर की तरह लगती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक द्वापर युग में जब गाय और भैंसों को पत्थर का बना दिया था यह वही शिलाएं आज भी मौजूद हैं। ग्रामीणों के मुताबिक कुछ शिलाएं तो हल्की ऊंगली लगाने से भी हिलती हैं।

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Edited By: Sumit Kumar