केदारनाथ के रावल बोले, हिंदू समाज के बगैर लिंगायतों की कल्पना संभव नहीं
केदारनाथ धाम के रावल भीमाशंकर का कहना है कि हिंदू समाज के बगैर वह लिंगायतों की कल्पना भी नहीं करते।
देहरादून, [देवेंद्र सती]: हिंदुओं की आस्था के केंद्र और विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के रावल भीमाशंकर लिंग वीरशैवा व लिंगायत सुमदाय को अल्पसंख्यकों के समान सुविधाएं देने की पैरवी तो करते हैं, लेकिन उन्हें हिंदुयुक्त समाज में ही मानते हैं। हिंदू समाज के बगैर वह लिंगायतों की कल्पना भी नहीं करते। लिंगायत समुदाय से आने वाले भीमाशंकर कहते हैं कि 'लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के रूप में मान्यता देने की वकालत कर रही कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के लिए यह मुद्दा 12 मई के बाद खत्म हो जाएगा।'
दरअसल, कर्नाटक में विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले सिद्धारमैया सरकार ने इसी साल मार्च में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेज प्रदेश के प्रभावशाली समुदाय लिंगायतों को अल्पसंख्यकों के रूप में मान्यता देने की पैरवी कर डाली। इसके बाद यह मुद्दा न केवल कर्नाटक की राजनीति में छाया, बल्कि देश में बहस का केंद्र बिंदु भी बन गया। रावल भीमाशंकर लिंग कांग्रेस के इस प्रस्ताव को राजनीति से प्रेरित बताते हैं।
वह कहते हैं कि कांग्रेस ने अपने प्रस्ताव में वीरशैवा की उपेक्षा की है, जबकि लिंगायत और वीरशैवा एक ही हैं। बावजूद इसके प्रस्ताव में उनका जिक्र नहीं किया गया। वह कहते हैं कि इस बारे में कर्नाटक सरकार से शिकायत भी की गई थी।
रावल के अनुसार वर्ष 2017 में केदारनाथ धाम के कपाट बंद होने से एक दिन पहले 20 अक्टूबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ आए थे, तब उन्होंने उन्हें एक पत्र सौंपा था। पत्र में वीरशैवा -लिंगायत समुदाय को उसी प्रकार की सुविधाएं देने की पैरवी की गई थी, जैसी, बौद्ध, जैन और सिखों को दी जाती हैं। उन्होंने बताया कि इस समुदाय की आबादी देश में पांच करोड़ के आसपास है और उनके सर्वांगीण विकास के लिए ये सुविधाएं मिलनी जरूरी हैं।
लिंगायत को हिंदुओं से अलग मान्यता दिए जाने के सवाल पर वह कहते हैं कि 'हिंदू-सनातन धर्म से अलग होने का सवाल ही नहीं है। भारत हिंदू राष्ट्र है और यहां रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है।' तल्ख स्वर में वह कहते हैं कि राजनीति के नाम पर निजी स्वार्थ के लिए हिंदू समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है।
चुनाव के दौरान कर्नाटक में अगर इस तरह के हालात बनते हैं जिससे लिंगायत-वीरशैवा समुदाय के बीच मतभेद की आशंका उत्पन्न हो तो क्या वह कर्नाटक जाएंगे? इस पर रावल ने स्पष्ट किया कि राजनीति से उनका कोई लेना देना नहीं है, लेकिन धर्मनीति में अन्याय हो तो वे अवश्य हस्तक्षेप करेंगे।
जगदगुरु होने के नाते यह उनका फर्ज भी है। धर्म को संभालना उनका दायित्व है, इस परंपरा को संभालना ही पड़ेगा, परंपरा कानून से बढ़कर है। इसके लिए वह देश ही नहीं, विदेश जाने से भी नहीं हिचकिचाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा लिंगायत और वीरशैवा सदा से एक रहे हैं, इसलिए ऐसे हालात शायद ही बनें।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।