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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 14, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

इस युवा का हाथ लगते ही अनमोल हो जाता है चावल का दाना, जानिए कैसे

By Raksha PanthariEdited By:
Published: Fri, 14 Jun 2019 05:12 PM (IST)Updated: Fri, 14 Jun 2019 08:44 PM (IST)

ऋषिकेश में सड़क किनारे एक ऐसे कलाकार का डेरा है जिसके हाथ लगाते ही साधारण सा चावल का दाना भी अनमोल बन जाता है।

इस युवा का हाथ लगते ही अनमोल हो जाता है चावल का दाना, जानिए कैसे
इस युवा का हाथ लगते ही अनमोल हो जाता है चावल का दाना, जानिए कैसे

ऋषिकेश, दुर्गा नौटियाल। ऋषिकेश में त्रिवेणी घाट के समीप सड़क किनारे एक ऐसे कलाकार का डेरा है, जिसके हाथ लगाते ही साधारण सा चावल का दाना भी अनमोल बन जाता है। दरअसल, यह कलाकार चावल के दाने पर लेखन का कार्य करता है। यानी आप चावल के दाने पर अपना नाम या कोई पसंदीदा शब्द लिखवाकर उसे चाबी के छल्ले के तौर पर सहेज सकते हैं, या फिर लॉकेट बनाकर गले में धारण कर सकते हैं। 

मूलरूप से लखनऊ निवासी स्ट्रीट आर्टिस्ट रमेश कुमार(34 वर्ष) के पिता खेती-बाड़ी का काम करते हैं। लेकिन, यह परिवार की गुजर के लिए नाकाफी ही है। इसी आर्थिक तंगी की वजह से रमेश को 19 साल की उम्र में घर छोड़ना पड़ा। दसवीं पास रमेश ने हरियाणा और पंजाब में माइक्रो आर्ट का हुनर सीखा और फिर दो वर्ष तक जैसे-तैसे गुजारा कर इस हुनर को धार दी। फिर वह ऋषिकेश चला आया। 

यहां रमेश ने त्रिवेणी घाट के समीप सड़क के किनारे अपना ठिकाना चुना और करीब 15 वर्ष से अपनी कला के जरिये लोगों को मोहित कर रहा है। रमेश छोटे-से चावल के दाने पर बेहद सुंदर ढंग से किसी का भी नाम लिख सकता है। वह चावल के दाने पर 'ऊं नम: शिवाय', 'जय सिया-राम', 'ऊं' जैसे शब्द उकेर कर उन्हें कांच की पानी भरी पारदर्शी ट्यूब में डुबो देता है। पानी में अपवर्तन के कारण उकेरे गए शब्द बड़े आकार में स्पष्ट नजर आते हैं। एक दाने में नाम लिखने में रमेश को दो से पांच मिनट तक का समय लगता है। 

रमेश राजमा, इलायची और बादाम के दानों पर भी इसी तरह की कलाकारी करता है। इसे लॉकेट या चाबी के छल्ले के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। लोग रमेश से चावल के दाने पर अपना नाम, मंत्र या फूल-पत्ती का डिजाइन बनवाकर यादगार के तौर पर साथ ले जाते हैं। रमेश का कहना है कि इस काम से वह रोजाना 500 से एक हजार रुपये तक कमा लेता है। रमेश ने आज तक अपने लिए स्थायी ठौर नहीं लिया है। गर्मी हो या सर्दी, वह खुले आसमान के नीचे कहीं भी सो जाता है। 

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