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    उत्तराखंड में 13 नवोदय विद्यालयों में सिर्फ पांच के पास ही अपने भवन

    By Sunil NegiEdited By:
    Updated: Thu, 05 Mar 2020 08:47 PM (IST)

    2003 से सभी जिलों में संचालित 13 नवोदय विद्यालयों में सिर्फ पांच के पास ही अपने भवन हैं। चार के पास भवन नहीं हैं। चार निर्माणाधीन हैं।

    उत्तराखंड में 13 नवोदय विद्यालयों में सिर्फ पांच के पास ही अपने भवन

    देहरादून, रविंद्र बड़थ्वाल। राजीव गांधी नवोदय विद्यालय का नाम लेते ही मस्तिष्क पर स्वाभाविक रूप से एक अच्छे आवासीय विद्यालय की छवि उभर आती है। उत्तराखंड में ऐसी ही उम्मीदों के साथ इन विद्यालयों की नींव डाली गई, लेकिन छात्रों के भविष्य के साथ राज्य में किए गए इस प्रयोग की हकीकत रुला देने वाली है। 2003 से सभी जिलों में संचालित 13 नवोदय विद्यालयों में सिर्फ पांच के पास ही अपने भवन हैं। चार के पास भवन नहीं हैं। चार निर्माणाधीन हैं। स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की सेवा नियमावली आज तक नहीं बनी। शिक्षकों के स्वीकृत 624 पदों में 45 फीसद से ज्यादा पद खाली हैं। इनमें 2755 बच्चे पढ़ रहे हैं। विभागीय समीक्षा में ये हाल देखकर मुख्य सचिव भौंचक रह गए। 16 साल पूरे हो चुके हैं, अपने प्रयोग से जब तंत्र की ही आंखें फटी हैं तो जनता के पास आंख बंद करने के सिवाय चारा भी क्या है।

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    खेलोगे कूदोगे तो बनोगे..

    शिक्षा महकमा एक पुरानी कहावत के साथ शिद्दत से कदमताल कर रहा है। पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगो तो बनोगे खराब, ये कहावत भले ही बेमायने साबित हो चुकी है। ऐसा ये महकमा कतई नहीं मानता। पुरानी बात पर कायम है। 5919 प्राथमिक, 1405 उच्च प्राथमिक और 1233 माध्यमिक विद्यालयों के पास अपने खेल मैदान नहीं हैं। सात हजार से ज्यादा विद्यालय खेल मैदान को तरस रहे हैं। शासन तक बात पहुंची तो सुझाव मिला, विधायक निधि से खेल मैदान के लिए धन का बंदोबस्त कराया जाए। विधानसभावार सूची ऐसे विद्यालयों की सूची विधायकों को दें और खेल मैदान के लिए गुहार लगाएं। जिला योजना में खेल मैदानों के लिए धन की व्यवस्था का सुझाव दिया गया। वर्तमान माहौल में जिसतरह तनाव पसर रहा है, ऐसे में बचपन को खेल-कूद का माहौल देकर सेहतमंद बनाना जरूरी है। सुझाव हैं, पर मानने को तैयार नहीं हो रहा शिक्षा महकमा।

    खर्च से फूले हाथ-पांव

    एक ओर पब्लिक स्कूलों के साथ जंग जैसे हालात, दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों से अभिभावकों का मोहभंग। समर्थवान पब्लिक स्कूलों के साथ पहले से नाता जोड़े हुए हैं। आरटीई ने गरीब और कमजोर तबके के लिए भी इन स्कूलों का रास्ता खोल दिया। हर साल 25 फीसद बच्चों का कोटा तय होने से सरकारी स्कूल खाली होने लगे हैं। अजब बात ये है कि सरकारी स्कूल भले ही खाली हो रहे हों, शिक्षा महकमे का बजट लगातार बढ़ रहा है। अब पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का खर्चा अलग से उठाना पड़ रहा है। मामला केंद्र सरकार के आरटीई एक्ट के प्रविधान का है, इस वजह से उम्मीद थी कि केंद्र से दनादन पैसा मिलेगा। केंद्र की दो टूक नसीहत, राज्य अपने बच्चों का खर्चा खुद उठाए। अब हाथ-पांव फूलने की नौबत है। स्कूल तकादा कर रहे हैं, सरकार अपनी पोटली से 107 करोड़ देने को बामुश्किल राजी हुई।

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    अफसरी भी हुनर है

    स्कूली शिक्षा गुणवत्ता के मोर्चे पर धड़ाम है। इस बात को खुद सरकार मानती है। जब-जब इसमें सुधार करने की बात शुरु होती है तो एससीईआरटी में बदलाव की चर्चाएं जोर मारने लगती हैं। उत्तराखंड ऐसा पहला अजूबा राज्य है, जहां कागजों में सरकारी आदेश में खड़ा किया गया एससीईआरटी का ढांचा और असलियत में मौजूदा ढांचा एकदूसरे से जुदा हैं। सरकार ने केंद्र सरकार के सुझाव पर इस ढांचे को उच्च शिक्षा के कैडर सरीखा बनाया है। आदेश में विभाग का मुखिया डीन है, जबकि विभागाध्यक्ष व अन्य पदों पर एसोसिएट प्रोफेसर व अस्टिटेंट प्रोफेसर को जिम्मा दिया गया है। स्कूली शिक्षा के शैक्षिक-प्रशासनिक ढांचे में ये पद ही नदारद हैं। लिहाजा शासनादेश दरकिनार, शिक्षा में शोध और नवाचार से जुड़े विशेषज्ञों की जगह महकमे के प्रशासनिक अधिकारी तैनात हैं। अब इस ढांचे को बदलने की तैयारी है। पुरानी व्यवस्था खत्म होगी। अधिकारी मौज में हैं। सलामत रहेगी कुर्सी।

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