Dehradun: खलंगा मेले में गोर्खाली रंग झलके, लोकनृत्यों और गीतों ने बांधा समां
देहरादून के सागर ताल नालापानी में खलंगा मेले का आयोजन किया गया। जिसमें गोर्खाली, गढ़वाली और कुमाऊंनी संस्कृति की झलक देखने को मिली। कलाकारों ने लोकनृत्य और गीतों से दर्शकों का मन मोह लिया। इस अवसर पर, गोर्खाओं की वीरता को दर्शाते हुए नौमती बाजा की प्रस्तुति भी दी गई। कार्यक्रम में कई विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। भारी भीड़ के कारण सड़क पर जाम की स्थिति बनी रही।

नालापानी स्थित सागर ताल में बलभद्र खालांगा विकास समिति की ओर से आयोजित मेले में उमड़ी भीड़। जागरण
जागरण संवाददाता, देहरादून : सागरताल नालापानी में बलभद्र खलंगा विकास समिति की अगुआई में आयोजित 51वें खलंगा मेले में गोर्खाली, गढ़वाली और कुमाऊंनी संस्कृति की भव्य झलक देखने को मिली। मेले में पहुंचे कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। वहीं, गोर्खाली व्यंजनों के स्टाल लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बने रहे।
रविवार को कार्यक्रम की शुरुआत विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी, विधायक उमेश शर्मा काऊ, सविता कपूर और पूर्व कर्नल विक्रम सिंह थापा द्वारा खलंगा युद्ध स्मारक पर वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद मंच पर अलग-अलग क्षेत्रों से आए कलाकारों ने गोर्खाली, गढ़वाली और कुमाऊंनी गीतों पर मनमोहक प्रस्तुतियां दीं।
गोर्खाली लोकनृत्यों की जोशीली थाप ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंच पर कौसेली संगीत समूह के कलाकारों, साथ ही देविन शाही, सतीश थापा, दीप्ति राना, सोनाली राई और अन्य गायकों ने मधुर गीतों के माध्यम से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। गुरांस सांस्कृतिक कला केंद्र, नालापानी टीम, महिला एकता समिति रायपुर, क्लेमेंटाउन और चंद्रबनी के कलाकारों ने भी अपनी बेहतरीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समां बांध दिया।
गोर्खाओं की वीरता और गौरवशाली इतिहास को दर्शाते हुए स्थानीय लोक कलाकारों ने प्राचीन नौमती बाजा (नौ पारंपरिक गोर्खाली वाद्ययंत्रों) की विशेष प्रस्तुति दी, जिसने पूरे वातावरण को उत्साह और ऊर्जा से भर दिया।
वहीं, मेले में आयोजित लाटरी के लकी ड्रा में विजेताओं को आकर्षक इनाम प्रदान किए गए। इस अवसर पर गीता थापा ने 1814-16 के आंग्ल-गोरखा युद्ध का संक्षिप्त इतिहास साझा करते हुए बताया कि यह युद्ध गोरखा सैनिकों की अदम्य वीरता और युद्ध कौशल का प्रतीक है।
इसी के उपरांत 24 अप्रैल 1815 को सुबाथू (हिमाचल प्रदेश) और अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में तीन गोरखा पलटनों की स्थापना हुई थी।
कार्यक्रम में पद्मश्री जागर गायिका बसंती बिष्ट, पद्मश्री पर्वतारोही कन्हैया लाल पोखरियाल, पर्वतारोही सुबेदार मेजर प्रवीन थापा, वरिष्ठ साहित्यकार पंडित कृष्ण प्रसाद पंथी, कर्नल ईश्वर थापा और उदय थापा को विशेष सम्मान प्रदान किया गया।
समिति के मुख्य संरक्षक व पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट, पदम सिंह थापा, प्रभा शाह, कर्नल सीबी थापा, राम सिंह थापा, महेश भूषाल, शशिकांत शाही, केबी कार्की, सुरेश गुरुंग, सुनीता गुरुंग, अशोक वल्लभ शर्मा और राकेश उपाध्याय सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।
नालापानी की संकरी सड़क बनी परेशानी का कारण
मेले में उमड़ी भारी भीड़ ने सड़क पर जाम की स्थिति पैदा कर दी। दोपहर 12 बजे के बाद वाहनों की बढ़ती संख्या से सागरताल की ओर जाने वाला संकरा मार्ग जाम होता चला गया। रास्ता संकरा होने के चलते मेले की ओर आने और वापस लौटने वाले वाहनों की भीड़ बढ़ती गई। कई लोग जाम में फंसने से परेशान होकर वापस लौट गए, जबकि कुछ लोग पैदल ही मेला स्थल तक पहुंचे।
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