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    जौनसार बावर में माघ मरोज लोक उत्सव की तैयारियां शुरू, 9 जनवरी से होगा परंपरागत पौष पर्व का आगाज

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 06:33 AM (IST)

    जौनसार बावर में 9 जनवरी से परंपरागत पौष त्यौहार और माघ मरोज लोक उत्सव का आगाज होगा। हनोल के पास कयलू महाराज मंदिर में चुराच के बाद 10 जनवरी को किसराट ...और पढ़ें

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    चंदराम राजगुरु, त्यूणी। जौनसार बावर की 39 खतों में जनवरी माह में मनाए जाने वाले परंपरागत पौष त्यौहार व माघ मरोज के लोक उत्सव का आगाज नौ जनवरी से होगा। क्षेत्र स्थिति हनोल के पास कयलू महाराज मंदिर में चुराच का पहला बकरा चढ़ने के बाद 10 जनवरी को परंपरागत तरीके से किसराट मनाई जाएगी। पौष त्यौहार का जश्न मनाने को स्थानीय लोग बकरों की खरीदारी में जुटे हैं। इस तरह क्षेत्र में एक माह तक मेहमाननवाजी का दौर चलेगा। लोक उत्सव के जश्न से पंचायती आंगन गुलजार रहेंगे।

    जौनसार बावर में पौष त्यौहार व माघ मरोज का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। 10 जनवरी को बावर-देवघार क्षेत्र की 11 खतों में किसराट का त्यौहार परंपरागत तरीके से मनाया जाएगा। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व टोंस नदी, जिसे पहले कर्मनाशा नदी कहते थे नरभक्षी किरमीर राक्षस का आतंक हुआ करता था। मानव कल्याण के लिए महासू देवता ने किरमिर राक्षस का वध किया। इसकी खुशी में क्षेत्र के लोग प्रति वर्ष 26 गते पौष मास में लोक उत्सव का परंपरागत जश्न मनाते हैं।

    मान्यता के अनुसार जौनसार बावर की 39 खतों से जुड़े 363 राजस्व गांवों के लोग घरों में बकरे काटकर मेहमाननवाजी करते हैं। कयलू महाराज मंदिर के पुरोहित मोहनलाल सेमवाल ने बताया कि इस बार नौ जनवरी को चुराच मनाई जाएगी। इसके अगले दिन बावर खत, देवघार, शिलगांव, बाणाधार, लखौ समेत आसपास इलाके में किसराट का त्यौहार मनाया जाएगा।

    पौष पर्व पर है मेहमाननवाजी की परंपरा

    क्षेत्र के लोग घरों में सुबह पहाड़ी लाल चावल के साथ उड़द की खिचड़ी (जिसे मशयाड़ा भात कहते हैं) को अखरोट, भंगजीरा एवं पोस्त दाने का मिश्रण कर मसाला बनाकर घी व तिल की चटनी के साथ बड़े चाव से खाते हैं। रात्रि भोज में बकरे का मीट, लाल चावल व रोटी परोसी जाती है।

    पंचायती आंगन लोक नृत्य से गुलजार रहते हैं। नौकरी पेशा लोग भी त्यौहार मनाने पैतृक गांव आते हैं। एक दूसरे के यहां दावत का दौर चलता है। लोग अपने करीबी रिश्तेदारों को दावत पर घरों बुलाते हैं। त्यौहार पर मामा के लिए सहभोज में बकरे की जिकुड़ी (बकरे का दिल) खाने में परोसने का रिवाज है। सामाजिक सौहार्द एवं खुशहाली का प्रतीक यह पर्व संयुक्त परिवार की अवधारण की मिसाल है।

    बकरों की मांग बढ़ी

    लोक उत्सव का जश्न मनाने को लोग बकरों की खरीदारी में जुटे हैं। क्षेत्र में मवेशी पालन का दायरा सिमटने से बकरों की कीमतें आसमान छू रही हैं। स्थानीय लोग बकरे खरीदने को ऊंची कीमत चुका रहे हैं। बकरों की कीमत 20 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक है। कालसी, अंबाडी, बाडवाला, विकासनगर व देहरादून में बकरों की मंडी लगने से कई खरीदार पहुंच रहे हैं। लोक मान्यता के अनुसार प्रतिवर्ष 26 गते पौष को कयलू महाराज मंदिर में चढ़ाए जाने वाले चुराच के बकरे के मांस का आधा हिस्सा टोंस नदी में किरमिर राक्षस के नाम से फेंका जाता है, ताकि क्षेत्र में कोई अनिष्ट न हो।