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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 22, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सनातनी संस्कृति के संवाहक हैं नागा संन्यासी, जानें- कैसे बनते हैं नागा; बेहद कठिन होती है प्रक्रिया

By Raksha PanthriEdited By:
Published: Mon, 22 Mar 2021 10:13 AM (IST)Updated: Mon, 22 Mar 2021 02:55 PM (IST)

Haridwar Kumbh Mela 2021 कुंभ में सबसे बड़ा आकर्षण दशनामी (दसनामी) संन्यासी अखाड़े होते हैं। यह दशनामी संबोधन इन्हें आदि ...और पढ़ें

सनातनी संस्कृति के संवाहक हैं नागा संन्यासी। जागरण
सनातनी संस्कृति के संवाहक हैं नागा संन्यासी। जागरण

दिनेश कुकरेती, देहरादून। Haridwar Kumbh Mela 2021 कुंभ में सबसे बड़ा आकर्षण दशनामी (दसनामी) संन्यासी अखाड़े होते हैं। यह दशनामी संबोधन इन्हें आदि शंकराचार्य का दिया हुआ है। इसकी भी एक लंबी कहानी है। असल में आदि शंकराचार्य ने पूरब में जगन्नाथपुरी गोवर्धन पीठ, पश्चिम में द्वारका-शारदा पीठ, उत्तर में ज्योतिर्मठ और दक्षिण में शृंगेरी पीठ की स्थापना के बाद देशभर में विभिन्न पंथों में बंटे साधु समाज को दस पद नाम देकर संगठित किया। ये दस नाम हैं तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती और पुरी। इन्हीं नामों के आधार पर वो दशनामी संन्यासी कहलाए। कालांतर में इन्हीं के बीच से नागा संन्यासियों का अभ्युदय हुआ। 

नागा, जो आकाश को अपना वस्त्र मानते हैं, शरीर पर भभूत मलते हैं, दिगंबर रूप में रहना पसंद करते हैं और युद्ध कला में उन्हें महारथ हासिल है। देखा जाए तो नागा सनातनी संस्कृति के संवाहक हैं और आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा का निर्वाह करते हुए विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं। हरिद्वार समेत दूसरे तीर्थों के दूरदराज इलाकों में ये आम जनजीवन से दूर कठोर अनुशासन में रहते हैं। इनके क्रोध के बारे में प्रचलित किवदंतियां भीड़ को इनसे दूर रखती हैं, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। कहते हैं दुनिया चाहे कितनी भी क्यों न बदल जाए, लेकिन शिव और अग्नि के ये भक्त इसी स्वरूप में रहेंगे। अब मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि नागा संन्यासी शीत को कैसे बर्दाश्त करते होंगे। 

असल में नागा तीन प्रकार के योग करते हैं, जो उन्हें शीत से निपटने की शक्ति प्रदान करते हैं। नागा अपने विचार और खानपान, दोनों में ही संयम रखते हैं। व्याकरणाचार्य स्वामी दिव्येश्वरानंद कहते हैं, देखा जाए तो नागा भी एक सैन्य पंथ है। आप इनके समूह को सनातनी सैन्य रेजीमेंट भी कह सकते हैं। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का उल्लेख मिलता है, जिनमें हजारों नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। ऐसा नहीं कि नागा साधु सिर्फ पुरुष ही होते हैं। कुछ महिलाएं भी नागा साधु होती हैं और गेरुवा वस्त्र धारण करती हैं।

ऐसे बनते हैं नागा

नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया बेहद कठिन और लंबी होती है। नए सदस्यों की नागा पंथ में शामिल होने की प्रक्रिया में तकरीबन छह साल लगते हैं। इस दौरान उन्हें सिर्फ एक लंगोट में रहना पड़ता है। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट का भी परित्याग कर देते हैं और फिर ताउम्र दिगंबर ही रहते हैं। नागा बनने से पूर्व अखाड़े संबंधित सदस्य की अच्छी तरह जांच-पड़ताल करते हैं। संतुष्ट हो जाने पर ही उसे अखाड़े में प्रवेश दिया जाता है। पहले उसे लंबे समय तक ब्रह्मचर्य में रहना होता है और फिर उसे क्रमश: महापुरुष व अवधूत बनाया जाता है। अंतिम प्रक्रिया का निर्वाह कुंभ के दौरान होता है। इसमें उसका स्वयं का पिंडदान, दंडी संस्कार आदि शामिल है।

मठ ही कहलाए अखाड़े 

आदि शंकराचार्य ने जब दशनामी संन्यासी परंपरा की नींव डाली, तब उन्हें यह भी महसूस हुआ कि सामाजिक उथल-पुथल के दौर में सिर्फ आध्यात्मिक शक्ति से इन चुनौतियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। सो, उन्होंने युवा साधुओं को सलाह दी कि वो शरीर को सुदृढ़ बनाने के साथ ही हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसके लिए ऐसे मठ स्थापित हुए, जहां व्यायाम के साथ शस्त्र संचालन का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। कालांतर में यही मठ अखाड़े कहलाए। 

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