राज्य ब्यूरो, देहरादून। प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में सरकार ने फिलहाल मोबाइल टेस्टिंग लैब चलाने से कदम पीछे खींच लिए हैं। इसका कारण इन लैब को लगाने में आने वाला खर्च है। एक मोबाइल टेस्टिंग लैब में तकरीबन एक करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है। यह रकम काफी अधिक है। इस कारण मोबाइल टेस्टिंग लैब के स्थान पर मोबाइल टेस्टिंग वैन बढ़ाने पर ही जोर दिया जा रहा है।

सरकार ने प्रदेश में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे मामलों को देखते हुए मोबाइल टेस्टिंग लैब चलाने का निर्णय लिया था। दरअसल, उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि गांव, जिला मुख्यालय से बहुत दूर हैं। पर्वतीय जिलों में जांच लैब जिला चिकित्सालयों में ही हैं। ऐसे में गांव-गांव से सैंपल एकत्र कर जिला लैब में भेजने और इनके नतीजे आने में काफी समय लगता है।

दूसरी लहर में पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक संक्रमण फैलने की आशंका थी तो यहां जांच में तेजी लाने के लिए मोबाइल टेस्टिंग लैब लगाने का निर्णय लिया गया। इस दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में मोबाइल टेस्टिंग वैन की संख्या भी बढ़ाई गई, जिससे सैंपल एकत्र करने के काम में तेजी लाई जा सके। इसी दौरान केंद्र ने सभी प्रदेशों में जांच में तेजी लाने के लिए मोबाइल टेस्टिंग लैब लगाने की दिशा में कदम उठाने को कहा।

उत्तराखंड ने भी केंद्र के दिशा-निर्देशों के क्रम में मोबाइल टेस्टिंग लैब लगाने की तैयारियां शुरू की। इस दिशा में जब कार्य शुरू हुआ तो यह बात सामने आई कि एक मोबाइल टेस्टिंग लैब की लागत तकरीबन एक करोड़ रुपये आ रही है। इतना ही नहीं इसमें टेस्टिंग के लिए अतिरिक्त स्टाफ की जरूरत भी पड़ेगी। इसमें भी काफी अधिक खर्च आएगा। अब क्योंकि कोरोना संक्रमण के मामले कम होने लगे हैं तो फिलहाल विभाग ने मोबाइल टेस्टिंग लैब लगाने का निर्णय स्थगित कर दिया है।

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Edited By: Sunil Negi