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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 04, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

पहली बार साठ के दशक में उठी थी गैरसैंण राजधानी की मांग, जानिए किसने उठाई थी

By Raksha PanthariEdited By:
Published: Wed, 04 Mar 2020 05:54 PM (IST)Updated: Thu, 05 Mar 2020 07:23 AM (IST)

गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग साठ के दशक में पहली बार उठी थी। इस मांग को उठाने वाले पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली थे।

पहली बार साठ के दशक में उठी थी गैरसैंण राजधानी की मांग, जानिए किसने उठाई थी
पहली बार साठ के दशक में उठी थी गैरसैंण राजधानी की मांग, जानिए किसने उठाई थी

देहरादून, जेएनएन। गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग साठ के दशक में पहली बार उठी थी। इस मांग को उठाने वाले कोई और नहीं, बल्कि पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली थे। यही वजह रही कि उत्तराखंड क्रांति दल ने उस दौर में गैरसैंण को गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर रखा था। 

उत्तरप्रदेश से एक अलग राज्य उत्तराखंड बनाने के साथ ही उसकी राजधानी गैरसैंण को बनाने की मांग उठने लगी थी। राज्य आंदोलनकारियों और उत्तराखंड क्रांति दल ने समय-समय पर इसकी मांग के लिए आंदोलन तेज किया। उनका अलग राज्य गठन का ये संघर्ष 9 नवंबर 2000 को खत्म हुआ और उत्तराखंड को राज्य का दर्जा मिला। हालांकि फिर उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण न होकर देहरादून(अस्थाई) बन गई। इसको लेकर फिर से आंदोलन शुरू हुए और राज्य आंदोलनकारियों ने 'पहाड़ी प्रदेश की राजधानी पहाड़ हो' का नारा बुलंद किया। इसलिए गैरसैण को जनभावनाओं की राजधानी भी कहा जाने लगा।  

अलग राज्य बनने के बाद गैरसैंण की धरती पर भी राजधानी के लिए कई आंदोलन शुरू हुए और समय के साथ इसकी मांग भी तेज होने लगी। इसके बाद प्रदेश में सरकारें बदली और गैरसैंण राजधानी का सपना भी जनता को दिखाया गया, लेकिन ये हकीकत नहीं बन पाया। इसे मुद्दा बनाकर राजनीतिक दल हमेशा अपनी राजनीति चमकाते रहे। फिर कांग्रेस सरकार के शासनकाल में गैरसैंण राजधानी की उम्मीदें एकबार फिर प्रबल हुई और तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा ने यहां विधानसभा भवन, सचिवालय, ट्रांजिट हॉस्टल और विधायक आवास  का शिलान्यस किया। इसके बाद पूर्व सीएम हरीश रावत के कार्यकाल के दौरान ये बनकर तैयार हुए, जिसके बाद से अब तक यहां छह सत्र आयोजित हो चुके हैं।  

इतिहास पर डालते हैं नजर 

राजधानी के तौर पर गैरसैंण का नाम सबसे पहले साठ के दशक में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने आगे किया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के साथ ही गैरसैण को प्रस्तावित राजधानी माना गया। उत्तराखंड क्रांति दल ने 1992 में गैरसैंण को उत्तराखंड की औपचारिक राजधानी तक घोषित कर दिया था। यही नहीं, यूकेडी ने पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण में एक पत्थर रख इसका नाम चंद्रनगर रख दिया था। 1994 में गैरसैंण राजधानी को लेकर लेकर क्रमिक अनशन भी किया गया और फिर इसी साल तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार की रमाशंकर कौशिक की अगुआई वाली एक समीति ने उत्तराखंड राज्य के साथ-साथ गैरसैंण राजधानी की भी अनुशंसा की थी। 

भाजपा रही गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी की पक्षधर 

एक ओर कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग करते रहे, तो भाजपा इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के पक्ष में रही। वहीं, भाजपा सरकार ने गैरसैंण राजधानी की दिशा में पहल की है। बुधवार को बजट भाषण की समाप्ति के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को स्थाई तो नहीं, पर ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा कर दी है। 

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