देहरादून, विकास धूलिया। कांग्रेस के दिग्गज नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सियासत से संन्यास की दहलीज से वापस लौट अब और ज्यादा आक्रामक तेवर अख्तियार कर लिए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद हालिया लोकसभा चुनाव में भी करारी शिकस्त की टीस के बावजूद उन्होंने अब बिल्कुल साफ कर दिया है कि भले ही सेहत उनका साथ नहीं दे रही है लेकिन वह मैदान छोड़ने वाले नहीं हैं। 

हरदा का कहना है कि हम अभी-अभी महायुद्ध हारे हैं, मैं भी इस युद्ध में एक सेक्टर का कमांडर था, अपने सैनिक साथियों को हार की हताशा से बाहर लाना मेरा कर्तव्य है। 

उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले पांच साल से लगातार पराजय दर पराजय का सामना कर रही है। पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सूबे की पांचों सीटें भाजपा के हाथों गंवाई और फिर वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल होकर महज 11 सीटों पर सिमट गई। भाजपा अकेलेदम 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीट जीतने में कामयाब रही। 

उत्तराखंड में ये दोनों चुनाव कांग्रेस ने हरीश रावत के नेतृत्व में लड़े क्योंकि तब वे ही कांग्रेस की प्रदेश सरकार के मुखिया थे। विधानसभा चुनाव में बतौर मुख्यमंत्री दो सीटों से ताल ठोकने वाले रावत दोनों जगह पराजित हुए। 

ढाई साल पहले विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश इकाई में मचे अंदरूनी घमासान को थामने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने हरीश रावत को केंद्र की सियासत में वापस बुला उन्हें राष्ट्रीय महासचिव की अहम जिम्मेदारी के साथ असम का प्रभार सौंप दिया। 

इसके बावजूद रावत उत्तराखंड का मोह नहीं त्याग पाए। यही वजह रही कि इस साल की शुरुआत में लोकसभा चुनाव का मौका आया तो वह नैनीताल सीट से मैदान में उतर गए। यह बात दीगर है कि एक बार फिर मोदी मैजिक ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। 

कांग्रेस लगातार दूसरी बार पांचों सीटों पर भाजपा से पराजित हो गई। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के ऐलान पर दो सप्ताह पहले रावत ने भी महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। तब उनके इस फैसले को सियासत से संन्यास के कदम के रूप में लिया गया, लेकिन इस तरह की चर्चा शुरू होते ही उन्होंने स्पष्ट करने में देरी नहीं की कि फिलहाल उनका ऐसा कोई इरादा नहीं।

दरअसल, वर्ष 2014 में जब हरीश रावत ने विजय बहुगुणा के उत्तराधिकारी के रूप में उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद संभाला, उस समय पार्टी के तमाम दिग्गजों को यह रास नहीं आया। पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। 

इसके बाद मार्च 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में दस कांग्रेस विधायक भाजपा में चले गए। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन कैबिनेट मंत्री व दो बार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रहे यशपाल आर्य भी कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस को इतनी संख्या में वरिष्ठ नेताओं को खोने का खामियाजा चुनावी हार के रूप में भुगतना भी पड़ा। 

स्वयं हरीश रावत भी पार्टी के इस प्रदर्शन के कारण लगातार अपने साथी नेताओं के निशाने रहे हैं। सोमवार को राजधानी देहरादून में कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान रावत की पार्टी के अन्य नेताओं से बनी दूरी साफ नजर आई। रावत इस कार्यक्रम में बगैर संबोधन ही वापस लौट गए। 

मंगलवार को हरीश रावत ने सोशल मीडिया में पोस्ट कर भाजपा के साथ ही अपनी पार्टी के नेताओं को भी निशाने पर लेने में देर नहीं की। रावत ने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि-यह समय मान-अपमान का नहीं है, हमारे सम्मुख अस्तित्व की लड़ाई है। कर्नाटक और गोवा में वही किया जा रहा है, जो हमने मार्च 2016 में उत्तराखंड में झेला है, निशाने पर सारा भारत है। 

सियासत में सक्रिय रहने के संकेत देते हुए उन्होंने आगे लिखा है-मैं खराब स्वास्थ्य के बावजूद चुनाव हारने के दिन से ही असम और उत्तराखंड, दोनों जगह सक्रिय हूं, एकता प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहा हूं। दिल्ली में मेरे फिजीशियन ने मुझे दो बार टीएमटी टेस्ट व एमआरआई करवाने की सलाह दी है मगर यह समय इससे चिंतित होने का नहीं है। 

हालांकि इसी पोस्ट में हरीश रावत ने पार्टी की एकजुटता की सराहना भी की है, लेकिन आखिर में उन्होंने जो लिखा, उससे साफ हो गया कि वह अंदरूनी मतभेदों से किस कदर आजिज आ चुके हैं। 

उन्होंने लिखा-आपको याद है लोकसभा चुनाव के वक्त वोट पड़ने से पहले ही एक अति महत्वपूर्ण नेता ने सार्वजनिक घोषणा कर दी थी कि हम अर्थात इंडियन नेशनल कांग्रेस उत्तराखंड केवल एक सीट जीत रही है, तीन और सीटें भी मेरे साथ दहेज में उत्तराखंड भाजपा को दे दी थी। मैंने हलाहल पिया इसीलिए सार्वजनिक जीवन में मेरे पास अमरत्व का वरदान है।

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