देहरादून, जेएनएन। कूड़ा निस्तारण के लिए सेलाकुई शीशमबाड़ा में बनाया गया सूबे का पहला सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट व रिसाइक्लिंग प्लांट पिछले पांच माह से बिना एनओसी चल रहा। प्लांट के संचालन के लिए हर साल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 'कंसर्न टू ऑपरेट' एनओसी जरूरी होती है, लेकिन इस बार बोर्ड ने प्लांट को एनओसी नहीं दी है। प्लांट को दी पिछली एनओसी अगस्त-2019 में खत्म हो चुकी है। इसके बाद अवैध रूप से प्लांट में कूड़े का निस्तारण किया जा रहा। एनओसी नहीं देने के पीछे प्लांट में चल रही गड़बड़ि‍यां वजह बताईं जा रहीं। प्लांट मैनेजर अहसान सैफी ने बताया कि बोर्ड में एनओसी का आवेदन किया हुआ है। जल्द एनओसी मिल सकती है।

जनवरी-2017 में शुरू हुआ प्रदेश के पहले सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट का दो साल बाद भी विवादों से नाता नहीं छूट रहा है। जन-विरोध के चलते यह प्लांट सरकार के लिए पहले ही मुसीबत बना है और अब प्लांट प्रबंधन की लापरवाही सरकार के सिर का दर्द बनती जा रही। दावे किए जा रहे थे कि यह पहला वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट है, जो पूरी कवर्ड है और इससे किसी भी तरह की दुर्गंध बाहर नहीं आएगी, मगर नगर निगम के यह दावे तो शुरुआत में ही हवा हो गया था। उद्घाटन के महज दो साल के भीतर अब यह प्लांट कूड़ा निस्तारण में भी 'फेल' हो चुका है। यहां न तो कूड़े का निरस्तारण हो रहा, न ही कूड़े से निकलने वाले दुर्गंध से युक्त गंदे पानी (लिचर्ड) का। स्थिति ये है कि यहां कूड़े के पहाड़ बन चुके हैं और गंदा पानी बाहर नदी में मिल रहा। दुर्गंध के चलते समूचे क्षेत्र की जनता प्लांट के विरोध में सड़कों पर उतरी हुई है और रोजाना धरने प्रदर्शन हो रहे।

अब स्थिति ऐसी है कि दो साल के अंदर ही प्लांट ओवरफ्लो होने लगा है। अब यहां और कूड़ा डंप करने की जगह ही नहीं बची है। ऐसे में यहां सड़ रहा ये कूड़ा आसपास के हजारों ग्रामीणों के लिए 'अभिशाप ' का रूप ले चुका है। हालांकि, प्लांट संचालित करने वाली रैमकी कंपनी कूड़े से खाद तो बनाने का दावा तो रही है, मगर धीमी गति होने की वजह से खाद कम बन रही है व कूड़ा ज्यादा डंप हो रहा। कंपनी दावा कर रही कि रोजाना 300 मीट्रिक टन कूड़ा इस प्लांट में पहुंच रहा, लेकिन हकीकत यह है कि यहां आधे कूड़े का भी निस्तारण रोजाना नहीं हो पा रहा।

प्लांट का विवादित सफर

जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत वर्ष 2009 में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बनाने की कवायद शुरू हुई थी। उस दौरान परियोजना का बजट 24 करोड़ रुपये था, मगर प्रक्रिया तमाम कानूनी दांवपेंचों में फंस गई व प्लांट कर निर्माण पीछे होता चला गया। बहरहाल नवंबर-2014 में सुप्रीम कोर्ट व एनजीटी ने प्लांट निर्माण को मंजूरी दी व दो साल टेंडर व बजट की प्रक्रिया चलती रही। इस कारण इसका बजट 36 करोड़ जा पहुंचा। ग्रामीणों के भारी विरोध, पथराव व उपद्रव के दौरान तीन अक्टूबर-16 को प्लांट का शिलान्यास हुआ और इसके निर्माण में तेरह महीने का समय लगा। करीब सवा आठ एकड़ में बने प्लांट में एक दिसंबर-17 से कूड़ा डालना शुरू किया गया था, लेकिन प्रोसेसिंग कार्य 23 जनवरी-18 को उद्घाटन के बाद शुरू हुआ। उद्घाटन के दिन ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यहां उठ रही दुर्गंध पर सख्त नाराजगी जाहिर कर इसके उपचार के निर्देश दिए थे, मगर यह दुर्गंध कम होने के बजाए बढ़ती चली गई। दिखावे के लिए निगम की ओर से वायु प्रदूषण जांच कराई गई, लेकिन निजी एजेंसी के जरिए हुई जांच भी सांठगांठ के 'खेल' में दब गई। जन-विरोध लगातार जारी है और दुर्गंध को लेकर स्थानीय लोग प्लांट बंद करने की मांग कर रहे।

हर माह 92 लाख हो रहे खर्च

नगर निगम द्वारा प्लांट का संचालन कर रही रैमकी कंपनी को हर माह कूड़ा उठान से लेकर रिसाइकिलिंग के लिए 92 लाख रुपये दिए जा रहे हैं लेकिन, इस रकम का कारगर उपयोग नहीं हो रहा। प्लांट में सड़ रहा कूड़ा लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है।

चेंबर्स का पता ही नहीं

प्लांट के भीतर कंपनी ने कूड़ा डंपिंग के लिए 30 चेंबर बनाए हुए हैं। कूड़े के पहाड़ के नीचे अब यह चेंबर दिखाई नहीं दे रहे। एक चेंबर में कूड़े को 30 दिन रखे जाने के बाद उससे खाद बनाई जानी थी और उसके बाद ये प्रोसेस साइक्लिंग में चलती रहती। लेकिन जिस तेजी से यहां कूड़ा डंप किया जा रहा है उस तेजी से खाद नहीं बनाई जा रही। ऐसे में चेंबर भी ओवरफ्लो हो गए हैं। अब कंपनी खुले आसमान के नीचे ही कूड़े के ढेर लगा रही है, जो सड़ रहा है।

अब खाद भी बन रही कूड़ा

शीशमबाड़ा प्लांट को शुरू हुए दो वर्ष हो चुका है। कंपनी ने कूड़े को रिसाइकिल कर अब तक जो खाद बनाई है, उसे लेने कोई नहीं आ रहा। ऐसे में खाद भी प्लांट में ही डंप है व कूड़ा हो रही है। कंपनी की ओर से 20 टन खाद रोजाना बनाई जा रही उसे भी वहीं डंप किया जा रहा है।

20 हजार मीट्रिक टन नॉन-डिग्रेडेबल कूड़ा डंप

प्लांट में लगभग 20 हजार मीट्रिक टन नॉन-डिग्रेडेबल कूड़ा जमा है। कंपनी द्वारा अभी तक इस कूड़े के निस्तारण को लेकर कोई रास्ता नहीं निकाला जा सका है। रोज इस ढेर में टनों कूड़ा और डंप हो रहा है।

कूड़ा उठान में भी कंपनी नाकाम

डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन कर रही रैमकी कंपनी से जुड़ी चेन्नई एमएसडब्लू कंपनी भी कूड़ा उठान में भी नाकाम साबित हो रही है। कंपनी की ओर से शहर के साठ वार्डों में कूड़ा उठान के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन स्थिति यह है कि इसकी गाड़ी एक एक हफ्ते तक वार्ड में नहीं जा रही। पार्षद से लेकर आमजन तक इसका विरोध जता चुके हैं। लगातार शिकायतें बढ़ती जा रहीं।

एक जगह खत्म कर दो जगह डाल दी मुसीबत

नगर निगम ने सहस्रधारा रोड से ट्रेंचिंग ग्राउंड हटाकर वहां के ग्रामीणों की सालों पुरानी मुसीबत तो खत्म कर दी पर दूसरी जगह ग्रामीणों को स्थायी रूप से मुसीबत दे दी। दरअसल, सहस्रधारा रोड के लोगों ने ट्रेंचिंग ग्राउंड के विरोध में सुप्रीम कोर्ट व एनजीटी की शरण ली थी। लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेंचिंग ग्राउंड बंद करने के लिए 30 नवंबर-17 की तारीख तय की थी। इसके बाद एक दिसंबर से पूरे शहर का कूड़ा शीशमबाड़ा में डंप किया जा रहा था। अब निगम ने हरिद्वार बाइपास पर एक ट्रांसफर स्टेशन बनाया हुआ है। छोटी गाड़ी वहां कूड़ा ले जाकर डंप करती है और बड़े ट्रकों में यह कूड़ा शीशमबाड़ा ले जाया जा रहा। हरिद्वार बाइपास पर रिहायशी इलाके के पास बना ये ट्रांसफर स्टेशन अब लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। बाइपास व शीशमबाड़ा में दुर्गंध से लोगों को बीमारी व संक्रमण के खतरे बढ़ गए हैं।

नगर निगम की दरियादिली अब पड़ रही भारी

रैमकी कंपनी पहले से ही उत्तराखंड में दागी रही है। देहरादून आइएसबीटी निर्माण के हालात से हर कोई वाकिफ है। इसलिए निर्माण क्षेत्र में इस कंपनी से कोई भी काम नहीं लिया जा रहा था। बावजूद इसके नगर निगम ने रैमकी कंपनी को इतने बड़े प्लांट का जिम्मा सौंप दिया। उस दौरान भी नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठे थे, मगर अधिकारियों ने बड़े-बड़े दावे कर सवालों को शांत करा दिया।

यही नहीं, प्लांट तैयार करने को जिंदल ग्रुप भी राजी था, लेकिन निगम की ओर से इतनी शर्तें लगा दीं गई कि जिंदल ग्रुप पीछे हट गया। बाद में यही शर्तें रैमकी कंपनी के लिए हटा दी गईं थी। नगर निगम के अफसरों की रैमकी कंपनी से 'सांठगांठ' अब आमजन पर भारी पड़ रही। शीशमबाड़ा और इसके समीप ग्रामीणों की मुसीबत बढ़ती जा रही और सांस लेना भी मुश्किल होता जा रहा। यही 'दरियादिली' निगम अधिकारियों ने डोर-टू-डोर कूड़े के उठान का जिम्मा रैमकी की करीबी चेन्नई एमएसडब्लू कंपनी को देने में भी बरती व नतीजा आज सबके सामने है।

बोले अधिकारी

विनय शंकर पांडेय (नगर आयुक्त) का कहना है कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को लेकर जो भी शिकायतें मिली हैं, उसका गंभीरता से निस्तारण किया जा रहा। प्लांट को जल्द एनओसी मिल जाएगी। इसके लिए पीसीबी को रिमाइंडर भेजा जाएगा। 

एनर्जी प्लांट पाने की चाह में रिसाइक्लिंग प्लांट फेल

कूड़ा निस्तारण प्लांट को दो साल में फेल करने के पीछे रैमकी कंपनी की साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता। नगर निगम सूत्रों की मानें तो कंपनी यहां खाद बनाने के प्लांट के बजाए यहां ऊर्जा प्लांट शुरू करना चाहती है। दरअसल, खाद की निम्न गुणवत्ता के चलते इसके खरीददार नहीं आ रहे। ऐसे में कंपनी 'दबाव' बना शासन में लंबित ऊर्जा प्लांट की फाइल मंजूर कराना चाह रही है। यही कारण है कि कूड़ा निस्तारण प्लांट को लगातार विवादों में लाया जा रहा। आमजन को परेशानी होगी और सरकार ऊर्जा प्लांट की फाइल जल्द मंजूर हो जाएगी।

कूड़े के पहाड़ लगने से हालात ये हैं कि प्लांट के आसपास ही नहीं बल्कि दो-तीन किलोमीटर तक दुर्गंध से आमजन का सांस लेना मुहाल हो रहा। प्लांट के उद्घाटन पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत व सहसपुर के विधायक सहदेव पुंडीर ने भी दुर्गंध उठना गलत बताया था। मुख्यमंत्री ने तभी दुर्गंध दूर करने के लिए एंजाइम छिड़काव कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन निगम से इसका अनुपालन नहीं किया। उधर, कंपनी अपनी मंशा पूरी करने के लिए कूड़े के ढेर लगाने में जुटी रही, ताकि जन-विरोध और बढ़ता जाए। कंपनी यहां ऊर्जा प्लांट लगा दोहरा मुनाफा कमाना चाहती है। कूड़ा निस्तारण के लाखों रुपये मिल ही रहे, ऊर्जा बेचकर अलग रकम मिलेगी।

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दुर्गंध दूर करने को एंजाइम का किया जाएगा छिड़काव

प्लांट से उठ रही दुर्गंध और जनविरोध की गूंज सरकार तक भी पहुंच गई है। सहसपुर विधायक सहदेव सिंह पुंडीर लगातार प्लांट के चलते हो रही मुसीबतों की शिकायत को सरकार के समक्ष रख रहे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने महापौर सुनील उनियाल गामा को दुर्गंध दूर करने के तत्काल उपाए करने के निर्देश दिए। महापौर ने बताया कि प्लांट में दुर्गंध एंजाइम से दूर की जाएगी। महापौर ने बताया कि आर्ट ऑफ लिविंग से निगम ने करार किया है।

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Posted By: Sunil Negi

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