देहरादून, [दिनेश कुकरेती]: हास्य रस को नौ रसों में श्रेष्ठ माना जाता है। शायद इसीलिए जब हम हंसते हैं तो उन चंद पलों के लिए जीवन की सभी परेशानियों और झमेलों को भूल जाते हैं। यही वह रस है, जो मनुष्य को जानवरों से अलग करता है। केवल इन्सान ही हंसना जानता है, सही मायने में जीवन को भरपूर जीने का मजा वही उठाता है।

'चक्रधर के चमन में' तो ऐसा ही है भाई। प्रथम देहरादून लिटरेचर फेस्ट-2017 के अंतिम दिन पुस्तक प्रेमियों को हिंदी जगत के जाने-माने लेखक, व्यंग्यकार, कवि एवं नाटककार डॉ. अशोक चक्रधर के इसी चमन से रूबरू होने का मौका मिला।

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असल में यह पुस्तक उनके व्यंग्यात्मक लेखों का एक ऐसा ही गुलदस्ता है, जिसमें रोजमर्रा की साधारण-सी बात या घटना को अशोक चक्रधर ने व्यंग्य की स्याही में डुबाकर ऐसे पिरोया कि वह अनूठी और यादगार बन गई।

अशोक कहते हैं कि फूहड़ता से पैदा किया गया हास्य, हास्य नहीं है। फूहड़ता मस्तिष्क में विचलन पैदा करती है, जबकि सहज हास्य अंतर्मन को प्रफुल्लित कर देता है। अफसोस! कि सहज हास्य लगातार खोता जा रहा है और उसकी जगह द्विअर्थी संवाद व अश्लील हाव-भाव लेते जा रहे हैं।

समाज की मनोवृत्ति को परिभाषित करते हुए अशोक कहते हैं कि जिसके पास पूंछ है, उसी की पूछ भी है। उदाहरण के तौर पर इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि एक के पास मूंछ थी और एक के पास पूंछ। मूंछ वाले को कोई पूछता नहीं था, जबकि पूंछ वाले की हर जगह पूछ थी।

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मूंछ वाले के पास तनी हुई मूंछ का सवाल था, तो पूंछ वाले के पास झुकी हुई पूंछ का जवाब। पूंछ की दो दिशाएं नहीं होती हैं। या तो वह भयभीत होकर दुबकेगी या मुहब्बत में हिलेगी। मारेगी या मरेगी, पर एक वक्त में एक ही काम करेगी। मूछें क्यों अशक्त हैं, क्योंकि दो दिशाओं में विभक्त हैं। तभी तो एक झुकी मूंछ वाला झुकी पूंछ वाले से बोला, यार! मैं जिंदगी में उठ नहीं पा रहा हूं।

इस पर पूंछ वाला बोला, बिल्कुल नहीं उठ पाओगे। कारण, एक मिनट में समझ जाओगे। बताता हूं, तुम बिना हाथ लगाए अपनी मूंछ उठाकर दिखाओ और मैं अपनी पूंछ उठाकर दिखाता हूं। जो उठा सकता है, वहीं उठ सकता है। इसीलिए पूंछ वालों की सत्ता है। तो मितरों! हास्य तो पूंछ और मूंछ से भी पैदा किया जा सकता है। इसके लिए अश्लील होने या अश्लील बोलने की क्या जरूरत।

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Posted By: Gaurav Kala