देहरादून, जेएनएन। रविंद्र बड़थ्वाल। मार्च फाइनल में उत्तराखंड के बजट का बड़ा हिस्सा ढेर हो गया। चालू वित्तीय वर्ष 2019-20 के आखिरी महीने में उत्तराखंड के शुरुआती दिन हड़ताल तो बाद के बचे-खुचे दिनों पर कोरोना की भयावह मार के चलते करीब दो हजार करोड़ बजट के इस्तेमाल पर संकट खड़ा कर दिया है। मामला यहीं थमता नजर नहीं आ रहा। कोरोना ने नए वित्तीय वर्ष के बजट को लेकर भी सरकार की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। जन सुरक्षा की बड़ी चुनौती ने विकास और कल्याण योजनाओं को हाशिए पर धकेल दिया है।

उत्तराखंड राज्य बने हुए 19 साल से ज्यादा वक्फे में पहली बार उत्तराखंड के सामने इसतरह का संकट खड़ा हुआ है। सरकार के सामने एक ओर करीब सवा करोड़ की आबादी को कोरोना के खतरे से बचाने की चुनौती है तो दूसरी ओर साल के आखिरी महीने में ढांचागत विकास और जन कल्याण योजनाओं के बजट की सैकड़ों करोड़ की राशि खर्च न होने का संकट है। 

राज्य में यह परंपरा बन चुकी है कि बजट का बड़ा हिस्सा अंतिम दिनों में ही ठिकाने लग पाता है। हालांकि वित्तीय व्यवस्था को बीते वषों में कुछ सुधारने का अच्छा असर ये रहा है कि महकमों और जिलों के लिए बजट की मंजूरी और जारी होने का कार्य ऑनलाइन हो रहा है। इससे बजट को खर्च के लिए मंजूरी देने की रफ्तार बढ़ी है। 

खर्च की गति तेज करने में अब भी सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं। बड़ी बात ये है कि इस बार आखिर में बजट खर्च करने से सरकार को वंचित रहना पड़ रहा है। मार्च महीना शुरू होते ही दो तारीख से लेकर 17 तारीख तक कर्मचारियों की हड़ताल के चलते शासन से महकमों को बजट की मंजूरी और फिर खर्च को लेकर मॉनीटरिंग पर बुरा असर पड़ा है।

चालू वित्तीय वर्ष का बजट खर्च नहीं होने का असर अगले वर्ष भी पड़ने से इन्कार नहीं किया जा सकता। बजट का उपयोग जितना कम होगा, नए वित्तीय वर्ष में केंद्र से मिलने वाले बजट पर इसका असर पड़ना तय है। वर्तमान में बजट का बड़ा हिस्सा सरेंडर करने की नौबत है। 

हालांकि सरकार का दावा है कि ऑनलाइन हर रोज करीब 100 करोड़ की राशि ड्रॉ हो रही है। कोरोना के चलते अब जिलों में भी काम जिसतरह ठप है,उससे ड्रॉ की जा रही धनराशि का उपयोग नहीं होने या इसके पाकिर्ंग होने का खतरे से सरकारी तंत्र सहमा है। ऐसे में कई बड़ी योजनाओं की धनराशि के उपयोग पर पेच फंसना ही है। 

कोरोना संकट का असर अगले वित्तीय वर्ष के बजट पर भी पड़ना तय है। नए बजट में कोरोना संकट का न कोई अंदाजा और न ही पूर्वानुमान लगाया जा सका था। ऐसे में नए वर्ष के पहले महीने अप्रैल से बजट की दिशा पहले किए गए नियोजन या रणनीति से संचालित होने के बजाए कोरोना प्रभाव में चलाना सरकार की मजबूरी बन गया है। 

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मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने स्वीकार किया कि कोरोना के चलते चालू और नए बजट की प्राथमिकताओं पर असर पड़ा है। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोरोना के खतरे को फैलने से रोकना है। बजट पर पड़े प्रभावों का अध्ययन बाद में किया ही जाएगा।

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Posted By: Bhanu Prakash Sharma

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