देहरादून, केदार, दत्त। Snow Leopard कोरोना संकट ने उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों की शान कहे जाने वाले हिम तेंदुओं (स्नो लेपर्ड) की गणना (आकलन) में बाधा डाल दी है। परिणामस्वरूप गंगोत्री नेशनल पार्क-गोविंद वन्यजीव विहार लैंडस्केप से लेकर अस्कोट वन्यजीव विहार तक फैले क्षेत्र में गणना की दिशा में कदम नहीं बढ़ाए जा सके हैं। वह भी तब जबकि फरवरी में इसका प्रोटोकाल तक तैयार हो गया था। असल में फरवरी में मौसम ने साथ नहीं दिया और मार्च से कोराना संकट गहराने के कारण गणना के सिलसिले में स्थानीय ग्रामीणों के साथ बैठकों का दौर भी शुरू नहीं हो पाया है। इन बैठकों के जरिये उन स्थलों को चिह्नित किया जाना था, जहां अक्सर हिम तेंदुओं की मौजूदगी की बातें सामने आती रही हैं।

उत्तराखंड भी देश के उन हिमालयी राज्यों में शामिल है, जहां संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) से वित्त पोषित सिक्योर हिमालय परियोजना संचालित हो रही है। उत्तराखंड के चीन सीमा से सटे गंगोत्री नेशनल पार्क, गोविंद वन्यजीव विहार और अस्कोट वन्यजीव विहार के दारमा, व्यास घाटी क्षेत्र को इस परियोजना में शामिल किया गया है। जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध यह उच्च हिमालयी क्षेत्र हिम तेंदुओं का घर भी है। इस क्षेत्र में हिम तेंदुओं की अच्छी-खासी संख्या होने का अनुमान है। वहां विभिन्न स्थानों पर लगे कैमरा ट्रैप में अक्सर कैद होने वाली तस्वीरें इसकी तस्दीक करती हैं।

सिक्योर हिमालय परियोजना के तहत हिम तेंदुओं समेत दूसरे वन्यजीवों का संरक्षण व उनके वासस्थल विकास पर भी खास फोकस किया गया है। यह परियोजना का महत्वपूर्ण अंग भी है। इसे देखते हुए सिक्योर हिमालय परियोजना के अंतर्गत अध्ययन आदि कराए गए। लंबे इंतजार के बाद इस क्षेत्र में हिम तेंदुओं का आकलन (गणना) कराने का निर्णय लिया गया।

असल में राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुओं की मौजूदगी के पुख्ता प्रमाण तो हैं, लेकिन इनकी वास्तविक संख्या को लेकर अभी भी रहस्य बरकरार है। वजह ये कि इनकी अभी तक गणना ही नहीं हो पाई है। ऐेसे में उम्मीद जगी के सिक्योर हिमालय परियोजना में गणना होने पर इस राज से पर्दा हट जाएगा। परियोजना के तहत इस सिलसिले में इस वर्ष की शुरुआत में गणना का प्रोटोकाल तैयार किया गया।

इसके तहत प्रथम चरण में उन क्षेत्रों को चिह्नित किया जाना है, जहां हिम तेंदुओं की मौजूदगी है या फिर ये वहां अक्सर नजर आते हैं। इस सिलसिले में इन तीनों संरक्षित क्षेत्रों से लगे और इनके अंतर्गत आने वाले गांवों के ग्रामीणों के साथ बैठकें होनी थीं। साथ ही सीमा पर सेना और आइटीबीपी के अधिकारियों संग भी परियोजना से जुड़े अफसरों की वार्ता होनी थी। वजह यह कि सेना व आइटीबीपी की चौकियों के इर्द-गिर्द भी पूर्व में हिम तेंदुओं की मौजूदगी की बातें सामने आई हैं।

इन बैठकों के बाद संभावित स्थलों की जानकारी मिलने पर वहां कैमरा ट्रैप लगाए जाने हैं। फिर हिम तेंदुओं की प्रत्यक्ष गणना के साथ ही फुटमार्क, मल आदि के नमूनों को भी लिया जाना है। इसके बाद आंकड़ों का विश्लेषण कर यह साफ हो सकेगा कि इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुओं की अनुमानित संख्या है कितनी।

जाहिर है कि इस पहल को लेकर हर किसी की उत्सुकता बढ़ गई थी, मगर कोरोना संकट ने इस राह में रोड़ा अटका दिया है। असल में यह समूचा क्षेत्र बेहद दुरुह और जटिल परिस्थितियों वाला है। इसे देखते हुए फरवरी में हिम तेंदुआ संभावित स्थलों की जानकारी हासिल करने और फिर मार्च से गणना की दिशा में कदम बढ़ाए जाने थे। इस सब पर पहले मौसम के साथ न देने और फिर कोरोना के बढ़ते मामलों ने कदम थामने को मजबूर कर दिया है।

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उत्तराखंड में सिक्योर हिमालय परियोजना के नोडल अधिकारी एवं अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक आरके मिश्र बताते हैं कि कोरोना संकट को देखते हुए फिलहाल बैठकों का क्रम शुरू नहीं हो पा रहा है। स्थिति सामान्य होने के बाद ही इस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। हालांकि, योजना के अन्य कंपोनेंट यानी आजीविका विकास समेत दूसरे पहलुओं के संबंध में ऑनलाइन बैठकों का सिलसिला शुरू किया गया है।

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Edited By: Sunil Negi

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