देहरादून, केदार दत्त। पलायन का दंश झेल रहे उत्तराखंड के गांवों में खेत अब वीरान नहीं रहेंगे, बल्कि इनमें फसलें लहलहाएंगी। खेती-किसानी की तस्वीर संवारने के मकसद से राज्य सरकार 'एक गांव-एक खेत' की अवधारणा को धरातल पर उतारने जा रही है। इसमें पर्वतीय इलाकों पर विशेष फोकस रहेगा। योजना के तहत गांव के सभी खेतों को एक मानते हुए उनमें सामूहिक रूप से खेती की जाएगी। खेती करने वाले सभी किसानों को उत्पादित अनाज का समान रूप से वितरण किया जाएगा। यही नहीं, जो लोग गांव से बाहर हैं, उनके खेतों का उपयोग करने पर उन्हें अनाज के रूप में कुछ हिस्सेदारी दी जाएगी।

सरकार की कोशिश है कि आने वाले खरीफ सीजन से इस व्यवस्था को धरातल पर उतारा जाए। खेती के नजरिये से देखें तो इसकी हालत बहुत बेहतर नहीं है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी इसकी तस्दीक करती है। वर्ष 2010-12 में यह 7.05 फीसद थी, जो अब घटकर 4.67 फीसद पर आ गई है। आकड़े बताते हैं कि गुजरे 18 वषरें में राज्य में 72 हजार हेक्टेयर से ज्यादा कृषि योग्य भूमि बंजर में तब्दील हुई है। हालांकि, गैर आधिकारिक आकड़ों पर गौर करें तो यह रकबा एक लाख हेक्टेयर के करीब पहुंच चुका है। यही नहीं, राज्य गठन के समय विरासत में मिली सवा तीन लाख हेक्टेयर कृषि योग्य बंजर भूमि का उपयोग अभी खोजना बाकी है। 

वर्तमान में कृषि योग्य बंजर भूमि का आंकड़ा करीब सवा चार लाख हेक्टेयर पहुंच चुका है। हालांकि कृषि की सूरत संवारने को दावे तो हुए, मगर धरातल पर गंभीरता से पहल नहीं हो पाई। यही कारण भी है कि जिन खेतों में फसलें लहलहाया करती थीं, वे धीरे-धीरे बंजर में तब्दील होते चले गए। गांवों से निरंतर हो रहे पलायन ने इसमें आग में घी का काम किया। इस सबके मद्देनजर सरकार ने अब केंद्र से मिले संबल के बाद खेती-किसानी की तस्वीर संवारने की ठानी है। किसानों की आय दोगुना करने के मद्देनजर उन्हें कृषि व इससे जुड़े क्षेत्रों के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी कड़ी में परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत राज्य में तैयार होने जा रहे 3900 कृषि क्लस्टरों में सामूहिक खेती पर जोर दिया जा रहा है। इस अवधारणा को नाम दिया गया है 'एक गांव-एक खेत'। 

यह एक प्रकार से कलेक्टिव फार्मिंग (सामूहिक खेती) है। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक इसके तहत गांव के सभी खेतों को एक मानते हुए इसमें वहां रह रहे सभी लोग सामूहिक रूप से खेती करेंगे। इसमें उन लोगों के बंजर हो चुके खेत भी शामिल होंगे, जो गांव से बाहर रह रहे हैं। उत्पादित फसल का खेती करने वाले सभी लोगों में समान रूप से वितरण होगा। यही नहीं, जो लोग गांव में नहीं रहते और उनके खेतों में खेती की जा रही है, उन्हें उनकी हिस्सेदारी का आधा भाग दिया जाएगा। 

ये होंगे फायदे 

-गांव के सभी खेतों में लौटेगी हरियाली, लहलहाएंगी फसलें 

-सामूहिक रूप से खेती करने पर समय और श्रम की होगी बचत 

-क्लस्टर आधार पर होने वाली खेती से उत्पादों के विपणन में होगी आसानी 

-जो लोग गांव से बाहर रह रहे हैं, वे भी खेती के लिए होंगे प्रोत्साहित 

-बंजर हो चुकी कृषि योग्य भूमि फिर से हो सकेगी उपजाऊ 

-पर्यावरणीय लिहाज से जलस्रोतों के संरक्षण में सहायक होगा यह प्रयास 

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