मसूरी, सूरत सिंह रावत। इन दिनों मशहूर अभिनेता, निर्देशक, एंकर और क्रिकेटर अभिनव चतुर्वेदी मसूरी की वादियों का लुत्फ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना को हराने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के बताए पांच स्टेप्स को फॉलो करना जरूरी है। 

उन्होंने कहा कि भारत, जल्द ही कोरोना से जंग जीत लेगा। इसका मुझे पूरा विश्वास है। बस, जरूरी यह है कि हम इसकी गंभीरता को समझें  और सभी नियमों का पालन करें। इस महामारी के परिपेक्ष्य में हमारे देश ने अब तक काफी अच्छा काम किया है। इसे हराने के लिए जरूरी है कि हर कोई प्रधानमंत्री मोदी के बताए पांच स्टेप्स को फॉलो करे। 

देश के पहले डेली शोप ‘हम लोग’ में नन्हे का किरदार निभाकर मशहूर हुए अभिनेता, निर्देशक, एंकर और क्रिकेटर अभिनव चतुर्वेदी इन दिनों मसूरी में हैं। वह यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठा रहे हैं। दैनिक जागरण से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि हमारे देश में साफ-सफाई सामान्य है। यहां घरों में वाल टू वाल कारपेटिंग और सेंट्रल एअरकंडीशनिंग नहीं है। हम खुली हवा में बात करते हैं। प्राकृतिक चीजों से हमारा सीधा नाता है। यही वजह है कि इतनी बड़ी जनसंख्या और सीमित संसाधन होने के बाद भी कोरोना के मोर्चे पर हमारी स्थिति कई विकसित देशों से संतोषजनक है। 

56 वर्षीय अभिनेता ने कहा कि मैं हर वर्ष मानसून से पहले हर हाल में मसूरी आता हूं, क्योंकि यहां की आबोहवा मुझे बुलाती है। मसूरी से मेरा आत्मिक संबंध है। बचपन में अभिनेता टॉम आल्टर और पूर्व अंतरराष्ट्रीय रोलर हॉकी रेफरी नंद किशोर बंबू के साथ क्रिकेट प्रतियोगिताओं में भाग लेने यहां आता था। शादी के बाद हनीमून मनाने मसूरी-धनोल्टी आया और जब पिताजी बीमार हुए तो उनको लेकर भी मसूरी आया था।

बनना चाहते थे क्रिकेटर, किस्मत बॉलीवुड ले आई

शानदार अभिनेता होने के साथ अभिनव एक बेहतरीन क्रिकेटर भी रहे हैं। मनोज प्रभाकर, मनिंदर सिंह, प्रवीण आमरे, मोहिंदर अमरनाथ, मदन लाल, नवजोत सिद्धू, चेतन चौहान, संजय मांजरेकर, कीर्ति आजाद जैसे दिग्गज क्रिकेटरों के साथ खेल चुके अभिनव ने रणजी में दिल्ली की टीम का प्रतिनिधित्व किया है। 

बीते दिनों को याद करते हुए अभिनव कहते हैं कि मैं तो क्रिकेटर ही बनना चाहता था, लेकिन किस्मत बॉलीवुड ले आई। फिलहाल वह दिल्ली में प्रोडक्शन हाउस चला रहे हैं।

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लॉकडाउन में सीखी संस्कृत

अभिनव चतुर्वेदी ने बताया कि लॉकडाउन में उन्होंने घर पर अपनी 22 वर्षीय बेटी से चटाई पर बैठकर संस्कृत सीखी। इस दौर में अच्छा है कि कुछ न कुछ सीखा जाए। वैसे भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती।

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Posted By: Bhanu Prakash Sharma

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