कश्मीरी केसर को रास आई कुमाऊं की जलवायु, धामस में तीसरे सीजन में भी अच्छे पैदावार के आसार
Kesar Farming In Village Almora कुमाऊं के अल्मोड़ा जिले के धामस गांव में युवकों ने केसर की खेती शुरू की है। शेर एक कश्मीर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको ...और पढ़ें

दीप सिंह बोरा, रानीखेत : कश्मीरी केसर (Kashmiri Kesar Farming ) को कुमाऊं के उच्च पहाड़ की आबोहवा रास आ गई है। कोसी घाटी के धामस गांव में तीन वर्ष पूर्व महासंकट में गांव लौटे प्रवासी ने बेराेजगार को मात देने के लिए जो अभिनव प्रयोग किया, वह सफल हो गया है। शेर एक कश्मीर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की मदद से धामस में लगाए गए केसर में लगातार तीसरे सीजन भी फूल खिले हैं।
छोटे स्तर पर ही सही लेकिन अब तक तीन ग्राम सेफ्रान निकाला जा चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है। इससे उत्साहित बागवान ने अब केसर का रकबा बढ़ाकर व्यावसायिक खेती की योजना बनाई है। ताकि स्वरोजगार को बढ़ावा देकर गांव के अन्य बेरोजगारों को भी लाल सोना यानि केसर की खेती से जोड़ आर्थिकी संवारी जा सके।

शीतलाखेत से लगे धामस गांव (हवालबाग ब्लाक) के रणजीत सिंह बिष्ट कोरोनाकाल में बहुराष्ट्रीय कंपनी की अच्छीखासी नौकरी छोड़ दिल्ली से पहाड़ लौट आए थे। इस दौरान जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण शोध संस्थान के राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत शेर ए कश्मीर कृषि विज्ञान एवं तकनीकी विवि को उत्तराखंड के उच्च इलाकों में केसर की खेती संबंधी परियोजना का जिम्मा दिया गया था।
रणजीत ने केसर की खेती से भविष्य संवारने की ठानी। आधा नाली भूखंड से शुरूआत की। संस्थान के सहयोग से तत्कालीन जिला उद्यान अधिकारी त्रिलोकीनाथ पांडेय ने कश्मीरी केसर के 11 किलो (करीब 300 बल्ब) उपलब्ध कराए। शेर ए कश्मीर विवि के विज्ञानियों की निगरानी में केश्मीर से मंगाए गए बल्ब धामस गांव में लगाए गए। उद्यान प्रभारी शीतलाखेत ऋचा जोशी ने निगरानी की।

केसर के लिएसमशीतोष्ण जलवायु व धूप बेहद जरूरी है। सितंबर में वर्षा अच्छी मानी जाती है। समुद्रतल से 1500 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर बरसाती पानी की बेहतर निकासी वाला भूभाग खेती के लिए उपयुक्त होता है। पैदावार के लिए अधिकतम 20 डिग्री सेल्सियस तापमान होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार सेफ्रान बल्ब मई से अगस्त तक सुशुप्तावस्था में रहते हैं। अगस्त में ही पुष्पावस्था शुरू होती है। सितंबर से अक्टूबर के बीच फूल खिल जाते हैं। फूल खिलने के दूसरे दिन ही इन्हें तोड़ कर केसर धागे निकाले जाते हैं।
ग्रोथ पर लगातार रखी जा रही नजर
शेर ए कश्मीर विवि प्रो. एमएच खान ने बताया कि उत्तराखंड में कश्मीरी केसर खिलना वहां की आर्थिकी सुधार का ठोस विकल्प हो सकता है। हम लगातार नजर रख अध्ययन कर रहे। गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आएगी। हां अतिवृष्टि केसर की खेती के लिए घातक है। पुष्पन में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

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