वाराणसी में नौ वर्षीय वसुधा भट्टराई को पाणिनि अष्टाध्यायी शलाका प्रतियोगिता में प्रथम स्थान
वाराणसी की नौ वर्षीय वसुधा भट्टराई ने पाणिनि अष्टाध्यायी शलाका प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया। गणेशोत्सव के अवसर पर शारदा भवन में आयोजित इस प्रतियोगिता में देश भर से प्रतिभागी शामिल हुए। तुलसी विद्या निकेतन की छात्रा वसुधा ने अपने ज्ञान से सभी को चकित किया। सबसे कम उम्र की प्रतिभागी के रूप में यह स्थान हासिल किया।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। शहर की नौ वर्षीय वसुधा भट्टराई ने पाणिनि अष्टाध्यायी शलाका प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। वाराणसी के शारदा भवन अगस्त्यकुण्ड में गणेशोत्सव के अवसर पर आयोजित इस प्रतियोगिता में देश के विभिन्न प्रदेशों से स्नातक, स्नातकोत्तर और मध्यमा स्तर के 100 से अधिक छात्र-छात्राएं शामिल हुए थे।
वसुधा, जो नगवां (लंका) स्थित तुलसी विद्या निकेतन की कक्षा तीन की छात्रा हैं, ने अपने ज्ञान और कठिन शास्त्र के अभ्यास से सभी को चकित कर दिया। उन्होंने पाणिनि अष्टाध्यायी के सूत्रों को उत्कृष्टता के साथ प्रस्तुत किया और सबसे कम उम्र की प्रतिभागी के रूप में प्रथम स्थान हासिल किया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल उनके परिवार को गर्वित किया, बल्कि पूरे विद्यालय और समुदाय में एक नई प्रेरणा का संचार किया है।
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इससे पहले भी वसुधा ने पांच से अधिक राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया है। उनके पिता, नारायण प्रसाद भट्टराई, बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के वेद विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वसुधा की सफलता उनके परिवार के शैक्षणिक माहौल का परिणाम है, जहां ज्ञान और शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
प्रतियोगिता में भाग लेने वाले अन्य प्रतिभागियों ने भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, लेकिन वसुधा की विशेषता उनके गहन अध्ययन और कठिन परिश्रम में निहित है। उन्होंने अपने ज्ञान के साथ-साथ आत्मविश्वास और दृढ़ता का परिचय दिया, जो कि किसी भी प्रतियोगिता में सफलता के लिए आवश्यक तत्व हैं।
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वसुधा की इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि यदि व्यक्ति में लगन और मेहनत हो, तो उम्र कोई बाधा नहीं बन सकती। उनकी सफलता ने यह संदेश भी दिया है कि युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, ताकि वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।
वसुधा भट्टराई ने न केवल अपनी उम्र के बंधनों को तोड़ा है, बल्कि उन्होंने सभी को यह भी दिखाया है कि शिक्षा और ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। उनकी इस उपलब्धि से प्रेरित होकर अन्य छात्र-छात्राएं भी अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित होंगे। वसुधा का यह सफर निश्चित रूप से आगे भी जारी रहेगा, और हम सभी को उनकी भविष्य की उपलब्धियों का इंतजार रहेगा।
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