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    काशी का ट्रैफिक अतिक्रमण से बेजार, हाथ से हाथ जुड़ें तब मिल पाएगी रफ्तार

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 09:50 AM (IST)

    वाराणसी, धर्म और पर्यटन का केंद्र, अतिक्रमण और यातायात जाम से जूझ रहा है। शहर की सड़कें, जो लाखों लोगों का भार सहती हैं, अतिक्रमण के कारण और भी संकरी हो गई हैं। चौराहों पर अवैध पार्किंग और मनमाने कट यातायात को बाधित करते हैं। ट्रैफिक व्यवस्था पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं है। दैनिक जागरण इस समस्या के खिलाफ अभियान शुरू कर रहा है, जिसका उद्देश्य सुगम यातायात सुनिश्चित करना है।

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    चौराहों पर पटरियों तक दुकान, आगे वाहनों का रेला बढ़ा रहा जाम। जागरण

    प्रमोद यादव, वाराणसी। काशी धर्म-अध्यात्म एवं पर्यटन की नगरी। मूर्त-अमूर्त धरोहरों को समेटे-सहेजे यह शहर पूर्वांचल की शिक्षा-चिकित्सा का केंद्र तो अर्थव्यवस्था की भी धुरी है। इस तरह कह सकते हैं प्रदेश के समूचा पूर्वी क्षेत्र और पश्चिमी बिहार तक के लिए इलाज, खरीदारी-व्यापार समेत हर जरूरत की पूर्ति का आधार है यह नगरी। गंगा स्नान, बाबा विश्वनाथ के दर्शन-ध्यान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन के लिए तो पूरे देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं।

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    इस शहर के मिजाज-अंदाज के समझने का प्रयास करते हैं और अनूठेपन पर रीझ जाते हैं। इस तरह इस नगरी की 40 लाख आबादी के साथ ही दस-पांच लाख अक्सर इस शहर में विविध कार्यों से आते-जाते हैं। यह लोड झेल पाने में प्राचीन नगरी की सड़कें असहाय नजर आती हैं। हाल के वर्षों में सड़कों का चौड़ीकरण जरूर हुआ, लेकिन सिस्टम डेवलप न होने से सब किया, धरा रह जाता है। अतिक्रमण बेजार करता है और दिन रात यहां वहां लगा जाम शहर की अर्थव्यवस्था को बीमार करता है।

    गौर करें तो शहर कोई सड़क न होगी जहां दुकान अपनी हद से आगे बढ़ी पाथवे घेरे नजर आती है। उसके आगे ठेला-खोमचा और फिर ग्राहक के वाहन से चलने के लिए सड़क आधी रह जाती है। चौराहों पर 100 मीटर तक वाहन खड़े करने पर पाबंदी लेकिन व्यवस्था को मुंह चिढ़ाते वाहनों की कतार प्रमुख चौराहों पर ही सर्वाधिक नजर आती है।

    सड़कें जहां कहीं अतिक्रमण से बची भी हैं वहां भी वाहन शायद ही रफ्तार भर पाएं, कारण रसूख के बल पर यहां-वहां मनमाने तरीके से बनाए गए कट और इनसे कौन कब मुड़े और हाथ-पैर की हड्डियों को दो टुकड़े कर जाए। ऐसा नहीं कि ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए पैसे की कमी हो। एक दशक में इस पर हजारो करोड़ खर्च किए जा चुके लेकिन सिगनल तक के नाम पर लाल-हरी बत्तियों का छलावा ही सामने आता है।

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    सिविक सेंस की कमी कह सकते हैं इन बत्तियों के बाद भी डंडा लिए चार-छह पुलिस न खड़ी हो तो वाहनों का रेला मनमाने तरीके से पार होता जाता है। इस तरह देखें तो बेशक, पुलिस-प्रशासन, विकास प्राधिकरण व नगर निगम में इच्छा शक्ति की कमी है, लेकिन इसमें जिम्मेदार शहरवासियों का वह हिस्सा भी है जो अपनी थोड़ी सी सुविधा के लिए पूरे सिस्टम को दुविधा में डालता है। बड़े-बड़े शोरूम लेकिन पार्किंग के लिए दो फीट नहीं छोड़ते। अंडर ग्राउंड बन भी गया तो मानक व नियम तोड़ते हैं।

    इन अव्यवस्थाओं की ओर हर एक का ध्यान आकर्षित करने के लिए दैनिक जागरण सोमवार के अंक से अभियान शुरू करने जा रहा है। इसमें हर खबरों के रूप में तो आपके साथ होंगे ही विविध गतिविधियों के जरिए आपके बीच भी आएंगे। हम सब मिल जुल कर सुगम आवागमन की राह बनाएंगे।