काशी में सातवीं सदी से मिलती है नवग्रहों के पूजन की परंपरा, जैन धर्म में भी नवग्रहों का उल्लेख
काशी में नवग्रहों के पूजन की परंपरा सातवीं शताब्दी ईस्वी से चली आ रही है, जिसका उल्लेख वैदिक और जैन धर्म ग्रंथों में मिलता है। स्मृतिकारों ने ग्रहयज्ञ ...और पढ़ें

सारनाथ संग्रहालय में एक उत्कृष्ट उदाहरण सुरक्षित है, जो इस प्राचीन परंपरा की लोकप्रियता को दर्शाता है।
| जागरण, वाराणसी। ज्ञवल्क्य स्मृति (1,295-98) में शांति, वर्षा, दीर्घायु, ऐश्वर्य और समृद्धि के लिए नवग्रहों के पूजन का विधान किया गया है। स्मृतिकारों ने ग्रहयज्ञ और ग्रह शांति का विधान किया है। यह परंपरा कुषाण-गुप्त काल से ज्ञात है, किंतु नवग्रहों का समूह में शिल्पांकन हमें सातवीं शती ई. से मिलता है जो मंदिरों के प्रवेश द्वारों के उत्तरंग पर और शिव पार्वती विवाह तथा जैन तीर्थंकरों एवं अन्य मूर्ति स्वरूपों में परिकर में मिलता है। नवग्रहों का स्वरूप कैसा हो, इसका उल्लेख विष्णुधर्मोत्तर पुराण (68,1-5), अग्नि पुराण (51,11), मत्स्य पुराण (94,2), अपराजितपृच्छा (214,10-19) और रूपमंडन जैसे ग्रंथों में हुआ है। वैदिक परंपरा के साथ ही जैन धर्म और कला में भी नवग्रहों का उल्लेख और अंकन हुआ है। काशी में घाटों पर और संग्रहालयों में कम से कम 10 मंदिरों के द्वार उत्तरंग के उदाहरण मिले हैं जिन पर समूह में नवग्रहों का अंकन हुआ है। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में 10 स्वतंत्र मंदिर प्राचीन काल में बने होंगे जो सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति को समर्पित रहे होंगे। ये सभी उदाहरण दसवीं से 12वीं शती ई. के बीच के हैं। सबसे सुंदर और पूरी तरह सुरक्षित उदाहरण सारनाथ संग्रहालय में है। इसके अतिरिक्त त्रिलोचन घाट स्थित तारकेश्वर महादेव मंदिर, पंचक्रोशी मार्ग के अवडेग्राम स्थित भीमेश्वर मंदिर, भैरवनाथ स्थित सुरहिया महादेव मंदिर, कपिलधारा स्थित कपिलेश्वर मंदिर और राज मंदिर स्थित हनुमान मंदिर, हनुमान घाट स्थित हनुमान मंदिर, भैरवनाथ स्थित काल भैरव मंदिर के प्रांगण में अलग-अलग स्वतंत्र रूप में नवग्रहों का अंकन हुआ है। हनुमान घाट स्थित काशी कामकोटीश्वर मंदिर 1974 में बना है, उसके भीतर सभी नवग्रहों का स्वतंत्र रूप से पारंपरिक लक्षणों के साथ अंकन हुआ है। इनमें उनके साथ वाहन और चतुर्भुज रूप में विभिन्न आयुध दिखाए गए हैं, जैसे सूर्य के दो हाथों में सनाल पद्म है और शनिदेव गृध पर बैठे हैं, उनके दो हाथों में धनुष और बाण हैं, पैरों की स्थिति से उनके पंगु होने का संकेत किया गया है। इसी प्रकार केतु को अर्ध सर्पाकार दिखाया गया है। सारनाथ संग्रहालय में 11वीं शती ई. का एक द्वार-उत्तरंग सुरक्षित है जो उस मंदिर की विशालता का संकेत देता है जिसका वह प्रवेश द्वार भाग रहा होगा। इस द्वार उत्तरंग के दाहिने छोर पर गजमुख गणेश और ललाट बिंब यानी बीच में पद्मधारिणी अभिषेक लक्ष्मी और बाएं छोर पर पुस्तक और वीणाधारिणी सरस्वती की आकृतियां हैं, मध्य में लक्ष्मी का अंकन मंदिर शक्ति को समर्पित रहे होने का संकेत देता है। इन आकृतियों के बीच में ही नवग्रहों की आकृतियों का संयोजन हुआ है। काशी से प्राप्त नवग्रह पट्टों के उदाहरण में यह सबसे सुंदर, सुरक्षित और महत्वपूर्ण है। प्रारंभ में ग्रहपति के रूप में द्विभुज सूर्य को संभंग में खड़ा और दोनों हाथों में सनाल पद्म धारण किए निरूपित किया गया है, जबकि बाद के अन्य पांच ग्रहों यानी सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति और शुक्र को खड़ा, द्विभुज और बाएं हाथ में जलपात्र लिए तथा दाहिने हाथ से या तो अभय मुद्रा या फिर वरद मुद्रा की अभिव्यक्ति के साथ दिखाया गया है। सातवें ग्रह के रूप में शनि को अभय मुद्रा में और जल पात्र के साथ तथा एक पैर मोड़े खड़ा दिखाया गया है। शनि का एक पैर दोषपूर्ण या पंगु रहा है, इसी कारण इस अंकन में शनि का यह स्वरूप दिखाया गया है। शनि की जितनी भी मूर्तियां हैं वह परंपरा में अपनी माता के शाप के कारण ही पंगु रूप में दिखाई गई हैं। उनका वाहन सामान्यतः गृध्र दिखाया गया है। सारनाथ के उदाहरण में राहु को अर्धकाय और केतु को अर्ध सर्पाकार दिखाया गया है। यद्यपि शास्त्रों में सभी ग्रहों के अलग-अलग लक्षणों का उल्लेख हुआ है किंतु काशी कामकोटीश्वर मंदिर जैसे स्वतंत्र ग्रह मूर्तियों के उदाहरण के अतिरिक्त अन्य सभी उदाहरणों में सोम से शनि तक के ग्रहों को अभय या वरद मुद्रा और फल या जलपात्र के साथ ही दिखाया गया है। इस प्रकार काशी में नवग्रहों का अंकन निश्चित रूप से लोकप्रिय था।
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