वाराणसी [हिमांशु अस्थाना]। लगभग सौ साल पहले आइआइटी- बीएचयू में स्थापित ताप विद्युत घर की चिमनी बेनको के नाम से दोबारा तैयार हो गई है। सौ फीट ऊंची इस चिमनी का शुभारंभ शताब्दी समारोह के अंत में 29 जनवरी को होगा। 1919 में आइआइटी, बीएचयू की स्थापना बनारस इंजीनियङ्क्षरग कॉलेज (बेनको) के नाम से हुई थी। वर्ष 1921 में 20 किलोवाट के ताप विद्युत गृह यहां स्थापित होने के बाद बेनको खुद ही बिजली बनाता था। एक वर्ष बाद ही क्षमता बढ़ाकर सौ किलोवाट तक कर दिया गया था। बिजली उत्पादन के दौरान उत्सर्जित होने वाला धुंआ इसी चिमनी से बाहर निकलता था।

पुरा छात्र प्रो. रामजी अग्रवाल के मुताबिक वर्ष 1930 में वृहद स्तर पर यहां बिजली बनाने का काम शुरू हुआ जिसकी आपूर्ति छात्रावासों व विभागों में होने लगी। आगे चलकर चिमनी पर एक सायरन लगाया गया जिसकी ध्वनि से ही इंजीनियङ्क्षरग की कक्षाएं चलती व खत्म होती। कहा जाता है कि चिमनी पठन-पाठन के साथ अनुशासन व टाइम मैनेजमेंट की सूचक भी थी। कालांतर में विद्युत व्यवस्था जब घर-घर सुलभ हो गई तो ताप विद्युत गृह व चिमनी को बंद कर दिया गया। 1986 में चिमनी का उपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त भी हो गया था जिसे हटा दिया गया और उसका दमदार चबूतरा वहीं मौजूद रहा। उसी नींव से एक बार फिर चिमनी को खड़ा करने की जिम्मेदारी आइआइटी, बीएचयू में मैटलर्जी विभाग से 1982 बैच के छात्र पी रामचंद्रन ने उठाई। उन्होंने खर्च का जिम्मा भी खुद ही उठाया। चेन्नई में नए चिमनी का निर्माण कराकर यहां लाया गया और आइआइटी में ठीक उसी जगह पर रीइंस्टाल हुआ। रामचंद्रन के मुताबिक यह बीएचयू का गौरव है। इसे हेरिटेज के रूप में स्थापित करना बड़ी बात है। चिमनी पर तडि़त चालक व एविएशन लाइट भी लगी है। कुछ दिनों में इस पर फिर से सायरन लगाई जाएगी, जिसकी ध्वनि बेनको की सौ साल पुरानी यादों को ताजा करेगी।

Posted By: Saurabh Chakravarty

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