सोनभद्र (जेएनएनन)। जिले से सटे झारखंड राज्य की सीमा पर नगर उटारी में भगवान वंशीधर का मंदिर स्थित है । यहां स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की करीब साढ़े तीन फीट ऊंची प्रतिमा खालिस सोने की है। बेहद दुर्गम पहाड़ों व वनों से गुजरकर इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पहुंचना पड़ता है इसके बाद भी दो वर्ष पूर्व तक यहां एक होमगार्ड भी नहीं होता था। हालांकि अब झारखंड पुलिस की गारद लगती है। लोगों का विश्वास है कि श्रीकृष्ण स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा अदृश्य शक्तियां करती हैं। 

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प्रतिमा के वजन पर कई मत 

यह मंदिर सन 1885 में बना, तभी यहां स्वर्ण प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा के वजन को लेकर सबका अपना अंदाजा है। कोई दो मन बताता है तो कोई चालीस मन। हालांकि मंदिर के प्रथम पुजारी स्व. पंडित श्रद्धेश्वर तिवारी लिखित पुस्तक -वंशीधर का संक्षिप्त इतिहास, के अनुसार वंशीधर की स्वर्ण प्रतिमा का वजन 32 मन है। पंडित श्रद्धेश्वर के वंशज व वर्तमान पुजारी 73 वर्षीय बृजकिशोर तिवारी बताते हैं कि कोई तौल तो नहीं हुई पर जानकारों का अनुमान 32 मन का ही है। 

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स्वर्ण प्रतिमा का इतिहास 

मंदिर के प्रथम पुजारी पंडित श्रद्धेश्वर तिवारी लिखित पुस्तक के अनुसार 1885 में नगरउटारी के महाराजा भवानी सिंह की विधवा रानी शिवमानी कुंवर ने 20 किलोमीटर दूर शिवपहरी में दबी इस कृष्ण प्रतिमा के बारे में स्वप्न देखा। इसके बाद एक सेना प्रतिमा खोजने के लिए निकली, रानी भी साथ थीं। शिवपहरी पहाड़ी के अनुमानित स्थल की खोदाई के बाद श्रीकृष्ण की अद्वितीय स्वर्ण प्रतिमा मिली। उसे हाथियों की मदद से नगर उटारी लाया गया। राजपुरोहितों के मशवरे पर वहीं मंदिर का निर्माण हुआ। प्रतिमा श्रीकृष्ण की ही थी इसलिए बनारस से राधारानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाई गई। 

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चोरी के सारे प्रयास विफल 

पंडित श्रद्धेश्वर तिवारी लिखित पुस्तक व वर्तमान पुजारी बृजकिशोर तिवारी के साथ ही जनश्रुतियों के अनुसार कई वर्ष पूर्व चोरी के प्रयास में गर्भगृह तक पहुंचे चोर मंदिर के बाहर ही नहीं निकल सके, उन्हें पकड़ लिया गया। बताते हैं कि आजादी के पहले एक अंग्रेज अफसर इस मूर्ति को लंदन ले जाना चाहता था मगर अंजान स्थितियों में वह विक्षिप्त हो गया। बताया जाता है कि 1930 के आसपास एक चोरी हुई भी थी जिसमें भगवान की स्वर्ण बांसुरी व छत्र चोरी हुआ। चोरों ने उसे बांकी नदी के पास छिपा तो दिया मगर उसके बाद अंधे हो गये। अंधे चोरों ने अपराध स्वीकार कर लिया हालांकि नेत्रहीन हो जाने से वो सटीक पता नहीं बता सके जहां उन्होंने स्वर्ण बांसुरी व छत्र छुपाया था। बाद में राजपरिवार ने स्वर्ण बांसुरी व छत्र दोबारा बनवाकर लगवाया। इन बातों का कोई साक्ष्य नहीं मगर, पुजारी बृजकिशोर कहते हैं ...आस्था की राह में सवाल नहीं होते, आस्था अनंत है। 

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प्रतिमा के वजन पर वैज्ञानिक पहलू 

आइआइटी बीएचयू भौतिकी विभाग के प्रो प्रभाकर सिंह  ने बताया कि सोने का घनत्व 19.32 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर होता है। स्वर्ण प्रतिमा यदि साढ़े तीन फीट ऊंची है तो उसमें तमाम डिजाइन आदि भी स्वाभाविक है। ऐसे में उसका वजन कुछ भी हो मगर 100 किलो से कम तो नहीं ही हो सकता।

 

Posted By: Nawal Mishra

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