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    शाकंभरी सिद्ध पीठ : शिवालिक की घाटी में शक्ति और शिव का अद्भुत संगम

    By Praveen Kumar Edited By: Praveen Vashishtha
    Updated: Fri, 02 Jan 2026 07:02 PM (IST)

    सहारनपुर की शिवालिक घाटी में स्थित श्री शाकंभरी देवी सिद्धपीठ शक्ति और शिव का अद्भुत संगम है। यहां माता शाकंभरी, शताक्षी, भीमा, भ्राम्भरी देवियों के स ...और पढ़ें

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    मुख्य मंदिर में स्थापित मूर्तियां।


    हरिओम शर्मा, जागरण, बेहट (सहारनपुर)। हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रृंखला की घाटी में श्री शाकंभरी देवी श्रद्धा और भक्ति का ऐसा सिद्धपीठ है जिसकी अलौकिकता में प्रकृति ने भी रंग भर दिए हैं। इस पंचकोशी परिक्रमा में शिव और शक्ति का अद्भुत संगम है। यहां मुख्य मंदिर में माता श्री शाकंभरी, शताक्षी, भीमा, भ्राम्भरी देवियों क साथ ही श्री गणेश जी की मूर्तियां स्थापित हैं।

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    मुख्य मंदिर के आसपास माता रक्तदंतिका और भैरव मंदिर हैं। मार्कंडेय पुराण में भी इनका उल्लेख है। इस परिक्षेत्र में रहकर चाणक्य और चंद्रगुप्त ने राजा नंद को परास्त करने की कूटनीति और सेना का गठन किया था। यहां वर्ष में तीन बड़े मेले लगते हैं जिनमें लाखों श्रद्धालु माता को शीश नवा कर मन्नतें मांगते हैं।

    पौराणिक कथाओं में शाकंभरी देवी

    पौराणिक कथाओं के अनुसार संकटग्रस्त देवताओं की पुकार पर माता शक्ति ने यहां युद्ध कर असुरों का संहार किया था। युद्ध स्थल को वीर खेत के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि उस समय लगातार वर्षा न होने के कारण वनस्पति नष्ट हो गई थी जिससे देवताओं की उदर पूर्ति के लिए माता शक्ति ने पृथ्वी में बाण का प्रहार किया था जिससे जलधारा फूटी थी और वनस्पति फिर से पुनर्जीवित हो गई थी। इसी शाक से देवताओं की उदर पूर्ति हुई थी। इसीलिए माता शक्ति यहां शाकंभरी के नाम से प्रख्यात हुई।

    माता से पूर्व भूरा देव मंदिर पर शीश नवाने की मान्यता

    माता के मुख्यमंदिर से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर जंगल के बीच माता रक्तदंतिका का मंदिर है। माता शक्ति का यह नाम वैप्रचिति नामक दैत्य का संहार करने पर दांतों के अनार के दानों की तरह लाल होने के कारण पड़ा। यहां से लगभग एक किलोमीटर पहले बाबा भूरादेव के नाम से भैरव मंदिर है जो माता शाकंभरी की सेना के सेनापति माने जाते हैं।

    मान्यता है कि माता के दर्शन से पूर्व बाबा भूरा देव के मंदिर में शीश नवाना आवश्यक है वरना यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है। माता के मुख्यमंदिर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर पहाड़ी पर ही माता छिन्नमस्ता देवी का मंदिर है। सिद्ध पीठ पहुंचने वाले श्रद्धालु इन सब मंदिरों में भी शीश नवाने पहुंचते हैं।

    राजनेता भी नवाते हैं यहां शीश

    वर्ष 2002 एवं 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने चुनाव का बिगुल माता के दर्शन करने के बाद ही फूंका था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी दो बार माता के दरबार में हाजिरी लगा चुके हैं। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी शाकंभरी सिद्ध पीठ पहुंचकर माता के दर्शन कर चुके हैं।

    पंचकोशी परिक्रमा में नारायण, देवियों और शिव के हैं मंदिर

    पुराणों के अनुसार श्री शाकंभरी देवी मंदिर से सामने पहाड़ी पर सात किलोमीटर दूर ठाकुर सहस्त्र धाम में भगवान विष्णु विराट रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि भगवान नारायण ने यहां तपस्या की थी और यहां पूजा अर्चना करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। ठाकुर मंदिर से ऊपर पहाड़ की चोटी पर पवित्र सूरजकुंड है जहां अनेक श्रद्धालु स्नान करते हैं। इसके अलावा सिद्धपीठ क्षेत्र में गौतम ऋषि की पवित्र गुफा भी है। इसके अलावा पंचकोसी परिक्रमा में पंच शिव स्थान भी है।

    कैसे पहुंचें

    यह सिद्ध पीठ सहारनपुर जिला मुख्यालय से 42 किलोमीटर दूर स्थित है। सहारनपुर से दिल्ली यमुनोत्री हाईवे के द्वारा बेहट और वहां से भुरादेव तक बसें जाती हैं। सहारनपुर के बेहद अड्डे से प्रत्येक 15 मिनट में बस शाकंभरी के लिए चलती है। अधिकतर श्रद्धालु अपने वाहनों से भी माता के दरबार तक पहुंचाते हैं।

    राणा जसमोर परिवार संभालता है व्यवस्था

    सिद्ध पीठ श्री शाकंभरी देवी की तमाम व्यवस्थाएं पूर्व रियासत जसमोर घराना करता है। परिवार में राणा आदित्य प्रताप सिंह का कहना है कि कईं सौ वर्ष पूर्व उनके पूर्वजों ने यहां मंदिर की स्थापना की थी। माता शाकंभरी उनकी कुलदेवी हैं। मंदिर की व्यवस्था पूर्व विधायक रानी देवलता व उनके पुत्र राणा आदित्य प्रताप सिंह, राणा सानिध्य प्रताप सिंह व राणा आतुल्य प्रताप सिंह संभालते हैं।

    वर्ष में लगते हैं तीन मेले

    इस सिद्धपीठ पर वर्ष में मुख्य रूप से तीन मेले लगते हैं। इसके अलावा वर्ष भर में सामान्य दिनों में भी हजारों श्रद्धालु माता के दरबार में शीश नवाने आते हैं। साप्ताहिक अवकाश रविवार के अलावा सप्ताह में मंगलवार को भी श्रद्धालुओं की संख्या में अच्छी खासी बढ़ोतरी हो जाती है। इसके अलावा चतुर्दशी और अष्टमी को भी श्रद्धालु भारी संख्या में माता के दरबार में पहुंचते हैं।